गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
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( उपर्युक्त स्थिति में ) एक सन्तान के बाद दूसरी सन्तान न उत्पन्न करे ॥ ८ ॥
अथैवमुत्पादितमपत्यं क्षेत्रिणो बीजिनो वेति विषये निर्णयमाह—
जनयितुरपत्यम् ॥ ९ ॥
जनयितुस्तदपत्यं भवति न क्षेत्रिणः। आपस्तम्बोऽपि—उत्पादियतुः पुत्र इति हि ब्राह्मणमित्यादि ॥ ९ ॥
इस प्रकार उत्पन्न पुत्र उत्पन्न करने वाले का होता है (क्षेत्री अर्थात् जिसकी पत्नी हो उसका नहीं) ॥ ९ ॥
समयादन्यस्य ॥ १० ॥
यदि ज्ञातयः समयं कृत्वा नियुञ्जते क्षेत्रिणोऽपत्यमस्त्विति यथा विचित्रवीर्यस्य क्षेत्रं सत्यवती तस्यां व्यासेनोत्पादितमपत्यमिति ॥ १० ॥
यदि नियोग के पूर्व ही निश्चय किया गया हो तो उसके अनुसार वह पुत्र क्षेत्री का भी हो सकता है ॥ १० ॥
जीवतश्च क्षेत्रे ॥ ११ ॥
यदा च जीवन्नेव क्षेत्री वन्ध्यो रुग्णो वा प्रार्थयते मम क्षेत्रे पुत्रमुत्पादयेति तदा क्षेत्रिण एवापत्यं न बीजिनः ॥ ११ ॥
क्षेत्री के जीवित रहने पर ( उसके रोगी, या बन्ध्य होने पर उसकी प्रार्थना से नियोग द्वारा पुत्र उत्पन्न किया गया हो तो ) वह क्षेत्री का ही होता है ( पुत्र उत्पन्न करने वाला का नहीं ) ॥ ११ ॥
परस्मात्तस्य ॥ १२ ॥
परस्माद्देवरादिव्यतिरिक्तात्तदनियुक्तायामप्यपत्यवत्यामनपत्यायां वोत्पन्नः पुनस्तस्यैव बीजिनो भवति न क्षेत्रिणः ॥ १२ ॥
किन्तु यदि देवर के अतिरिक्त किसी अन्य द्वारा ( बिना नियुक्त किये हुए भी ) उत्पन्न की गई सन्तान उत्पन्न करने वाले की होती है ( क्षेत्री की नहीं ) ॥ १२ ॥
द्वयोर्वा ॥ १३ ॥
एवमुत्पादितमपत्यं द्वयोर्वा भवति बीजिक्षेत्रिणोः। इदं नियुक्ताविषयम्।
तथा च याज्ञवल्क्यः—अपुत्रेण परक्षेत्रे नियोगोत्पादितः सुतः।
उभयोरप्यसौ रिक्थी पिण्डदाता च धर्मतः ॥ इति ॥ १३ ॥