गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि १९३
अथवा इस प्रकार उत्पन्न सन्तान दोनों (क्षेत्री अर्थात् स्त्री के वास्तविक पति और बीजी अर्थात् नियोग द्वारा उत्पन्न करने वाले) की होती है ॥ १३ ॥
रक्षणात्तु भर्तुरेव ॥ १४ ॥
यदि भर्ता क्षेत्र्येव रक्षणं भरणं पोषणं संस्कारादि करोति न बीजी तदा भर्तुरेव तदपत्यमिति । एवं मृते ॥ १४ ॥
यदि पति (क्षेत्री) ही भरण-पोषण और संस्कारादि करता है तो वह सन्तान उसी की होती है (नियोग द्वारा उत्पन्न करने वाले की नहीं) ॥ १४ ॥
श्रूयमाणेऽभिगमनम् ॥ १५ ॥
यदा तु भर्ता श्रूयते तस्मिन्देशे स्थित इति तदा तमभिगच्छेत् ॥ १५ ॥
(पति के कहीं अज्ञात स्थान पर चले जाने पर छः वर्ष तक प्रतीक्षा करे) पति के किसी स्थान पर होने का समाचार जानकर उसके पास जाये ॥ १५ ॥
प्रव्रजिते तु निवृत्तिः प्रसङ्गात् ॥ १६ ॥
यदि तु भर्ता प्रव्रजितो भवति मोक्षाश्रमं प्राप्तो भवति तदा सर्वस्मात्प्रसङ्गान्निवृत्तिः । स्वयमपि निवृत्तिमुखी संयतैव स्यादिति ॥ १६ ॥
यदि पति प्रव्रजित हो गया हो (मोक्षाश्रम में स्थित हो) तो सभी प्रसङ्गों से निवृत्त होकर (स्त्री को) संयम रखना चाहिए ॥ १६ ॥
द्वादश वर्षाणि ब्राह्मणस्य विद्यासम्बन्धे ॥ १७ ॥
विद्याधिगमार्थं प्रोषितस्य ब्राह्मणस्य भार्या द्वादश वर्षाणि क्षपयेत् । नापत्योत्पत्तिर्नाभिगमनम् ॥ १७ ॥
विद्याध्ययन के लिए दूसरे देश को गए हुए ब्राह्मण की पत्नी बारह वर्षों तक उसकी प्रतीक्षा करे ॥ १७ ॥
भ्रातरि चैवं ज्यायसि यवीयान्कन्याग्न्युपयमेषु ॥ १८ ॥
ज्येष्ठे भ्रातर्यकृतदारेऽनाहिताग्नौ च प्रोषिते कनीयान्भ्रातैवं द्वादश वर्षाणि प्रतीक्षेत । ततः कन्यामुपयच्छेदग्नींश्चाऽदधीत । अत्र वासिष्ठो विशेषः—अष्टौ दश द्वादश वर्षाणि ज्येष्ठं भ्रातरमनिदिष्टं न प्रतीक्षमाणः प्रायश्चित्तीयो भवतीति ।
द्वादशैव तु वर्षाणि ज्यायान्धर्मार्थयोग्यतः ।
न्याय्यः प्रतीक्षितुं भ्राता श्रूयमाणः पुनः पुनः ॥ इति च ॥ १८ ॥
(अविवाहित या बिना अग्नि का आधान किये हुए) बड़े भाई के विदेश
१३ गौ०