गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
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जाने पर छोटे भाई भी बारह वर्ष तक प्रतीक्षा करे, तदुपरान्त कन्या ग्रहण करे (अर्थात् विवाह करे) एवं अग्निहोत्र की अग्नि का आधान करे ॥ १८ ॥
षडित्येके ॥ १९ ॥
एके मन्यन्ते षडेव वर्षाणि प्रतीक्षेतेति। प्रोषिते चात्यन्तवृद्धे स्थिते चात्यन्तधर्मपर इदम् ॥ १९ ॥
कुछ आचार्यों का मत है कि (ऐसी स्त्री) छः वर्षों तक ही प्रतीक्षा करे ॥ १९ ॥
गतं प्रासङ्गिकं पुनरपि स्त्रीधर्मनाह— त्रीन्कुमारी ऋतूनतीत्य स्वयं युज्येतानिन्दितेनोत्सृज्य पित्र्या- नलङ्कारान् ॥ २० ॥
यदि कन्यां पित्रादिर्न दद्यात्ततस्त्रीनृतूनतीत्य स्वयमेवानिन्दितेन कुलविद्याशीलादियुक्तेन भर्त्रा युज्येत पित्र्यान्पितृकुलायातानलंकारानुत्सृज्य। अत्र मनुः— अलङ्कारं नाऽऽददीत पित्र्यं कन्या स्वयंवरा । मातृकं भ्रातृदत्तं वा स्तेयं स्याद्यदि किंचन ॥ इति॥ २० ॥
(यदि पिता आदि कन्या का विवाह न करें तो वह) कन्या तीन ऋतुकाल बीत जाने पर पिता के कुल से प्राप्त अलङ्कारों को त्याग कर स्वयं ही उत्तम (कुल, विद्या और शील से युक्त) वर के पास चली जाय ॥ २० ॥
अत एव— प्रदानं प्रागृतोः ॥ २१ ॥
ऋतुदर्शनात्प्रागेव देया कन्या ॥ २१ ॥
कन्या का विवाह उसके ऋतुकाल (रजोदर्शन) के पहले ही कर देना चाहिए ॥ २१ ॥
अप्रयच्छन्दोषी ॥ २२ ॥
तस्मिन्कालेऽप्रयच्छन्पित्रादिर्दोषवान्भवति । अत्र याज्ञवल्क्यः— पिता पितामहो भ्राता सकुल्यो जननी तथा । कन्याप्रदः पूर्वनाशे प्रकृतिस्थां परः परः ॥ अप्रयच्छन्समाप्नोति भ्रूणहत्यामृतावृत्तौ ॥ इति ॥ ॥ २२ ॥
उक्त समय से कन्या का विवाह न करने वाले (पिता आदि) दोषी होते हैं ॥ २२ ॥