भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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१९६ | गौतमधर्मसूत्राणि

अथवा सहस्र गायों वाले किसी ऐसे व्यक्ति से जो सोमपान न करता हो (उपर्युक्त प्रयोजन के लिए द्रव्य ले) ॥ २७ ॥

सप्तमीं चाभुक्त्वाऽनिचयाय ॥ २८ ॥

सप्तम्यर्थे द्वितीया। षट्सु वेलासु भोज्यालाभेनाभुक्त्वा सप्तम्यां वेलायां यावता वृत्तिस्तावदनुमतमप्यादेयम्। अनिचयः पुनस्तेन निचयो न कर्तव्यः श्वो भोज्यमपि नाऽऽदेयम्। अत्र मनुः—

तथैव सप्तमे भक्ते भक्तानि षडनश्नता।
अश्वस्तनविधानेन हर्तव्यं हीनकर्मणा ॥ इति ॥ २८ ॥

छः वेला भोजन न मिलने पर सातवीं वेला में भोजन मिलने पर उतना ही ग्रहण करे जितने से जीवन-वृत्ति चल सके; भोजन का दूसरे दिन के लिए संचय न करे ॥ २८ ॥


अप्यहीनकर्मभ्यः ॥ २९ ॥

अस्यामवस्थायामहीनकर्मभ्योऽप्यादेयम्। अपिशब्दः कथंचिदस्यानुज्ञातमिति दर्शयति। तेन प्राणसंशय एवेदं भवति ॥ २९ ॥

ऐसी अवस्था में अपने वर्ण के अनुरूप कर्म न करने वालों से भी ग्रहण किया जा सकता है ॥ २९ ॥


आचक्षीत राज्ञा पृष्टः ॥ ३० ॥

यद्यसावेवं कुर्वन्स्वामिभिर्गृहीतो राजसकाशं नीतस्तेन पृष्टः किमित्थमकार्षीरिति तदा स्वामवस्थामाचक्षीत। न तु मिथ्या वदेदिति ॥ ३० ॥

(यदि इस प्रकार कर्म करते हुए पकड़ा जाय और राजा के समीप ले जाया जाय तो) राजा द्वारा पूछे जाने पर अपनी दशा और अपना कर्म सही-सही बतावे ॥ ३० ॥


तेन हि भर्त्तव्यः श्रुतशीलसंपन्नश्चेत् ॥ ३१ ॥

हिञ्चार्थे। तेन च राज्ञा स न केवलमदण्ड्यः किं तर्हि तत आरभ्य भर्त्तव्यस्तवेयमवस्था मया न ज्ञातेति सान्त्वयित्वा। स चेच्छ्रुतवृत्तशीलसंपन्नो भवति। श्रुतं शास्त्रपरिज्ञानम्। शीलं तदनुकूल आचारः। इतरोऽपि न दण्ड्यः। भरणं तु तस्य तादृशं न कार्यम्। दण्डाभावः पूर्वयोरपि निमित्तयोः समानः ॥ ३१ ॥

यदि वह व्यक्ति विद्वान् और सदाचारी हो तो राजा द्वारा उसका पोषण होना चाहिए। (इस अवस्था में दूसरे का द्रव्य ग्रहण करते समय पकड़े गये व्यक्ति दण्ड्य नहीं होते.) ॥ ३१ ॥