गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 277, कुल 360 में से
संदर्भ में पढ़ें२१० गौतमधर्मसूत्राणि
दोभ्यो वाऽऽहृतेन जलेन पूरयित्वा ततस्तस्मादावर्जिता अप एनं चरित- प्रायश्चित्तमुपस्पर्शयेयुस्ताभिरद्भिः स्नापयेयुर्ज्ञातयः ॥ १० ॥
किन्तु यदि परित्यक्त पापी प्रायश्चित्त द्वारा शुद्ध हो जाय तो उसके शुद्ध होने पर उसके बन्धुगण एक अत्यन्त पवित्र सरोवर या नदी से जल लाकर उसके लिए सोने का घड़ा भरें उस घड़े के जल से उसे नहलावें ॥ १० ॥
अथास्मै तत्पात्रं दद्युस्तत्संप्रतिगृह्य जपेच्छान्ता द्यौः शान्ता पृथिवी शान्तं शिवमन्तरिक्षं यो रोचनस्तमिमं गृह्णामीति ॥ ११ ॥
अथ स्नापनानन्तरमस्मै स्नाताय तत्सौवर्णं पात्रं दद्युर्ज्ञातयः । स च तत्पात्रं प्रतिगृह्य जपेच्छान्ता द्यौरित्यादि गृह्णामीत्यन्तम् ॥ ११ ॥
तब वे उसे वह घड़ा दें और वह उसके बाद इस मन्त्र का जप करे 'शान्ता द्यौः शान्ता पृथिवी शान्तं शिवमन्तरिक्षं यो रोचनस्तमम् इमं गृह्णामि' "आकाश शान्त है, पृथिवी पवित्र है, अन्तरिक्ष निर्मल और शुभ है, मैं तेजपूर्ण इसे ग्रहण करता हूँ" ॥ ११ ॥
एतैैर्यजुर्भिः पावमानीभिस्तरत्समन्दीभिः कूष्माण्डैश्चाऽऽज्यं जुहुयाद्धिरण्यं ब्राह्मणाय दद्यात् ॥ १२ ॥
होमान्ते दानम् ॥ १२ ॥
तब वह पवमान, तरत्समन्दी तथा कूष्माण्ड यजुस् मन्त्रों के साथ आज्य की आहुति करे और ब्राह्मण को सोने का दान दे ॥ १२ ॥
गां वा ॥ १३ ॥
इच्छातो विकल्पः ॥ १३ ॥
अथवा गौ का दान दे ॥ १३ ॥
आचार्याय च ॥ १४ ॥
य आत्मन आचार्यस्तस्मा अपि हिरण्यं दद्याद् गां वा ॥ १४ ॥
( अपने ) आचार्य को भी स्वर्ण या गौ का दान दे ॥ १४ ॥
यस्य तु प्राणान्तिकं प्रायश्चित्तं स मृतः शुध्येत् ॥ १५ ॥
उत्तरविवक्षयेदमुच्यते । प्रायश्चित्तस्य शुद्धयर्थत्वादेव सिद्धा शुद्धिः ॥ १५ ॥
किन्तु जिस पापी का प्रायश्चित्त जीवनपर्यन्त चलता रहे वह मृत्यु के बाद ही शुद्ध माना जाता है ॥ १५ ॥