भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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पृष्ठ 283

२१६ गौतमधर्मसूत्राणि

श्चित्ते पृथगुपपातकप्रायश्चित्तमपि कर्तव्यमित्येवमर्थम् । एतच्चापत्योत्पाद- नपर्यन्तगमने द्रष्टव्यम् । पतितसावित्रिको यथाकालमनुपनीतो व्रात्यः । एतेषूपपातकं पापमिति ॥ ११ ॥

लघु पाप (उपपातक) का दोष उन व्यक्तियों को लगता है जो श्राद्ध भोजन कराने के लिये अयोग्य बताये गये व्यक्तियों में दुर्बल (गंजे सिर वाले) से पहले गिनाये गये हैं। गाय की हत्या करने वाले, वेद भूल जाने वाले, इनके लिए यज्ञ कराने वाले, मैथुन द्वारा ब्रह्मचर्य भंग करने वाले, और उपनयन की अवधि बीतने के कारण सावित्री मन्त्र से पतित व्यक्ति ॥ ११ ॥

अज्ञानादनध्यापनादृग्विगाचार्यौ पतनीयसेवायां च हेयौ ॥ १२ ॥

अज्ञानादनध्यापनादिति । यदि (यः) कर्मणि प्रवृत्त ऋत्विड्मन्त्रा- न्कर्मपद्धतिं वा न जानाति स च, य आलस्यादिना नाध्यापयत्याचार्यस्ता- वुभौ हेयौ त्याज्यौ । इदं पतितेन सह शयनासनादेः सेवायां प्रागप्यब्दा- त्परित्यागार्थम् । तर्हि संवत्सरेण पततीति वचनमनर्थकम् । न तादृशस्त्या- गोऽत्र विवक्षितः । किं तर्ह्यृत्विगाचार्यान्तरमुपादेयम् । अनुपादाने दोष इति ॥ १२ ॥

(यज्ञ के नियमों के विषय में) अज्ञान ऋत्विज् और (आलस्य आदि के कारण) अध्यापन से प्रमाद करने वाले आचार्य को और पतित व्यक्ति की सेवा करने पर इन दोनों का त्याग कर देना चाहिए ॥ १२ ॥

अन्यत्र हानात्पतति ॥ १३ ॥

अन्यत्राज्ञानादनध्यापनादन्यत्र तयोस्त्यागो न कर्तव्यः । कुर्वन्प- तति ॥ १३ ॥

इस के अतिरिक्त अन्य किसी स्थिति में इनका त्याग करने वाला पतित हो जाता है ॥ १३ ॥

तस्य च प्रतिग्रहीतेत्येके ॥ १४ ॥

तस्यर्त्विजमाचार्यमीदृशं त्यजतः प्रतिग्रहीता तं यः प्रतिगृह्णाति याज्य- त्वेन शिष्यत्वेनर्त्विगाचार्यौ वा सोऽपि पततीत्येके मन्यन्ते । एके ग्रहणा- ज्ज्ञात्वा प्रतिग्रहे पातित्यं नान्यत्रेति ॥ १४ ॥

कुछ लोगों का मत है कि अनुचित ढंग से अपने ऋत्विज् या आचार्य का परित्याग करने वाले व्यक्ति को शिष्य या यजमान बनाने वाला भी पतित हो जाता है ॥ १४ ॥