भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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सानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि ५

मौञ्जीज्यामौर्वीसौत्र्यो मेखलाः क्रमेण ॥ १५ ॥

मुञ्जो दर्भविशेषस्तद्विकारो मौञ्जी । मूर्वाऽरण्यौषधिविशेषः । ( सरलीति द्रविडभाषायाम् ) । तद्विकारा मौर्वी । ज्या चासौ मौर्वी चेति कर्मधारयः । ज्याशब्देन धनुषो ग्राह्येति यावत् । सौत्री सूत्रविकारः । एता वर्णक्रमेण मेखला भवन्ति ॥ १५ ॥

( ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लिए ) क्रमशः मूँज, मौर्वी घास की बनी हुई धनुष की डोरी और सूत की मेखला ( होती है ) ॥ १५ ॥

कृष्णरुरुबस्ताजिनानि ॥ १६ ॥

कृष्णः कृष्णसारः । रुरुर्बिन्दुमान्मृगः । बस्तश्छागः । एतेषामजिनान्युत्तरीयाणि क्रमेण । अजिनं त्वेवोत्तरं धारयेदित्यापस्तम्बीये दर्शनात् ॥ १६ ॥

( इन तीनों वर्णों के क्रमशः ) काले मृग के चर्म का, धब्बे वाले रुरु मृग के चर्म का और बकरे के चर्म का अजिन ( उत्तरीय ) होता है ॥ १६ ॥

वासांसि शाणक्षौमचीरकुतपाः सर्वेषाम् ॥ १७ ॥

शणविकारः शाणः । क्षुमाऽतसी तद्विकारः क्षौमम् । श्वेतपट्ट इत्यन्ये । दर्भादिनिर्मितं चीरम् । ऊर्णानिर्मितः कम्बलः कुतपः । चत्वार्येतानि वासांसि सर्वेषाम् ॥ १७ ॥

सन के, अतसी के, दर्भ आदि द्वारा निर्मित एवं ऊन के बने हुए कम्बल ( कुतप )—ये ( चारो ) वस्त्र सभी के ( ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य सभी वर्णों के ब्रह्मचारियों के ) होते हैं ॥ १७ ॥

कार्पासं वाऽविकृतम् ॥ १८ ॥

अविकृतं कार्पासं वासः सर्वेषाम् । कुसुम्भादिरागद्रव्यैर्वर्णान्तरकल्पनं विकृतिस्तद्रहितम् ॥ १८ ॥

अथवा बिना रंगा हुआ रुई का वस्त्र ( सभी द्विजाति ब्रह्मचारियों के लिये होना चाहिए ) ॥ १८ ॥

अनुमतान्याह —

काषायमप्येके ॥ १९ ॥

एके त्वाचार्याः कषायेण रक्तमपि धार्यं मन्यन्ते ॥ १९ ॥

कुछ आचार्यों का विचार है कि गेरुआ रंग का वस्त्र भी ( ब्रह्मचारी पहन सकता है ) ॥ १९ ॥