भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 360 में से

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पृष्ठ 69

४ गौतमधर्मसूत्राणि

वह (उपनयन संस्कार) दूसरा जन्म होता है। (इसके द्वारा उपनीत व्यक्ति द्विज कहा जाता है) ॥ ९ ॥

तद्यस्मात्स आचार्यः ॥ १० ॥

तदुपनयनं पितुरभावे यस्मात्पुरुषाद्भवति स आचार्यः ॥ १० ॥

वह (उपनयन संस्कार के समय का दूसरा जन्म) जिस पुरुष द्वारा होता है वह आचार्य कहलाता है ॥ १० ॥

न तु केवलदुपनयनात्। कस्मात्तर्हि—

वेदानुवचनाच्च ॥ ११ ॥

अनुवचनमध्यापनम्। अत्र मनुः—

उपनीय तु यः शिष्यं वेदमध्यापयेद् द्विजः।
सकल्पं सरहस्यं च तमाचार्यं प्रचक्षते ॥ इति ॥ ११ ॥

(उपनयन के उपरान्त बालक को) वेद का अध्यापन करने से भी (अध्यापन करने वाला आचार्य कहलाता है) ॥ ११ ॥

एकादशद्वादशयोः क्षत्रियवैश्ययोः ॥ १२ ॥

नित्योऽयमनयोः कल्पः। काम्यस्तु मनुना दर्शितः—

राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे वैश्यस्यार्थार्थिनोऽष्टमे ॥ इति ॥ १२ ॥

(गर्भकाल से) ग्यारहवें और सोलहवें वर्ष में (क्रमशः) क्षत्रिय और वैश्य का (उपनयन संस्कार करना चाहिए) ॥ १२ ॥

अथाऽऽपत्कल्पानाह—

आ षोडशाद् ब्राह्मणस्यापतिता सावित्री ॥ १३ ॥

अभिविधावाकारः। आ षोडशाद्वर्षाद् ब्राह्मणस्य सावित्र्यपतिताऽप्रच्युता। सावित्रीशब्देन तदुपदेशनिमित्तमुपनयनं लक्ष्यते। तदुपपनयनस्य काल इत्यर्थः ॥ १३ ॥

सोलहवें वर्ष तक ब्राह्मण के लिए सावित्री च्युत नहीं होती (उस समय तक सावित्री मंत्र के उपदेश का अर्थात् उपनयन की अवधि रहती है) ॥ १३ ॥

द्वाविंशते राजन्यस्य द्व्यधिकाया वैश्यस्य ॥ १४ ॥

उभयत्राप्याङनुवर्तते। पूरणप्रत्ययस्य लोपो द्रष्टव्यः। आ द्वाविंशाद्वर्षाद्राजन्यस्याऽऽचतुर्विंशाद्वैश्यस्यापतिता सावित्री ॥ १४ ॥

बाइसवें वर्ष तक क्षत्रिय की और उससे दो वर्ष अधिक अर्थात् चौबीसवें वर्ष तक वैश्य की (सावित्री च्युत नहीं होती) ॥ १४ ॥