भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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पृष्ठ 75
१०गौतमधर्मसूत्राणि

वाग्यतः शब्दमकुर्वन् । हृदयस्पृशः परिमाणार्थमिदं यावत्यः पीता हृदयं स्पृशन्ति यासु माषो मज्जति तावतीरप आचामेत्रिश्चतुर्वा । यत्र मन्त्रवदाचमनं विहितं तत्र तेन सह चतुः । अन्यत्र त्रिरिति विकल्पः ॥ ३५॥

( आचमन करते समय ) पवित्र स्थान पर बैठकर, दाहिनी बाँह को दोनों घुटनों के बीच में करके, यज्ञोपवीत को यथास्थान रखकर, कलाई तक हाथों को धोकर और मौन होकर तीन चार बार इतने जल से आचमन करे, जितना जल ( पीने पर ) हृदय तक पहुँच सके ॥ ३५ ॥

द्विः परिमृज्यते ॥ ३६ ॥

प्रतियोगं सोदकेन पाणिनाौष्ठयोः परिमार्जनम् ॥ ३६ ॥

प्रत्येक वार दोनों ओठों को हाथ में जल लेकर पोंछे ॥ ३६ ॥

पादौ चाभ्युक्षेत् ॥ ३७ ॥

चकाराच्छिरश्च ॥ ३७ ॥

दोनों पैरों ( और शिर ) पर जल छिड़के ॥ ३७ ॥

खानि चोपस्पृशेच्छीर्षण्यानि ॥ ३८ ॥

शीर्षे भवानि शीर्षण्यानि । शिरोभवानोति यावत् । खानोन्द्रियाणि । तान्युपस्पृशेत् । अत्र चकारः प्रतीन्द्रियोपस्पर्शनाथैः ॥ ३८ ॥

शिर की इन्द्रियों ( नेत्र, कान, मुख, नासिका-छिद्रों ) में प्रत्येक का स्पर्श करे ॥ ३८ ॥

मूर्धनि च दद्यात् ॥ ३९ ॥

चकारान्नाभौ मूर्धनि च सर्वाभिरङ्गुलिभिरुपस्पृशेदित्यर्थः ॥ ३९ ॥

( नाभि और ) सिर का सभी अंगुलियों से स्पर्श करे ॥ ३९ ॥

सुप्त्वा भुक्त्वा क्षुत्वा च पुनः ॥ ४० ॥

स्वापादिनिमित्ते पुनर्द्विराचामेदिति यावत् ॥ ४० ॥

सोने, भोजन करने और छींकने के बाद दो बार आचमन करना चाहिए ॥ ४० ॥

दन्तश्लिष्टेषु दन्तवदन्यत्र जिह्वाभिमशनात् ॥ ४१ ॥

दन्तश्लिष्टेषूच्छिष्टलेपेषु जिह्वाभिमशनादन्यत्र दन्तवन्नाशुचित्वम् ॥ ४१ ॥

दाँतों के बीच अटके हुए भोजन के उच्छिष्ट कणों में जीभ से न छू जा सकने वाले उच्छिष्टकण दाँतों के समान ही अपवित्र नहीं होते ॥ ४१ ॥