भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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पृष्ठ 76

सानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि ११

तत्रापि—

प्राक्च्युतेरित्येके ॥ ४२ ॥

सत्यपि जिह्वाभिमर्शने यावल्लेपाः स्वस्थानान्न च्यवन्ते तावन्नाशुचित्वमिति ॥ ४२ ॥

कुछ विद्वानों के मत से दाँतों में अटके हुए उच्छिष्ट कण जीभ से छुए जाने योग्य होने पर भी दाँतों से गिरने के पूर्व तक अपवित्र नहीं होते ॥ ४२ ॥

च्युतेष्वास्राववद्विद्यान्निगिरन्नेव तच्छुचिः ॥ ४३ ॥

आस्राव आस्यजलम् । निगरणमन्तःप्रवेशनम् । च्युतेषु निगिरन्नेवतच्छुचिरिति वक्तव्य आस्राववद्विद्यादिति वचनमास्रावे च निगरणादेव शुचिरिति सूचनार्थम् ॥ ४३ ॥

(दांतों में अटके हुए अच्छिष्ट कण के) दांतों से निकलने पर उन्हें लार के समान समझना चाहिए, और उनको निगलने से ही शुद्धि होती है ॥ ४३ ॥

न मुख्या विप्रुष उच्छिष्टं कुर्वन्ति । न चेदङ्गे निपतन्ति ॥ ४४ ॥

मुखे भवा मुख्याः । विप्रुष आस्रावबिन्दवः । भूम्यादिषु पतिता नोच्छिष्टतां नयन्ति ॥ ४४ ॥

मुख के लार की बूँदें (गिरने पर किसी पदार्थ को, जूठा या अशुद्ध नहीं बनातीं । शरीर के किसी अंग पर गिरती हैं तो भी उसे उच्छिष्ट नहीं करती हैं ॥ ४४ ॥

लेपगन्धापकर्षणं शौचममेध्यस्य ॥ ४५ ॥

वसा शुक्रमसृङ्मज्जा मूत्रविट्कर्णविण्नखाः ।
श्लेष्माश्श्रु दूषिका स्वेदो द्वादशैते नृणां मलाः ॥ इति मनुः ।
एतत्सर्वममेध्यशब्देन विवक्षितम् । अस्य यावता गन्धो लेपश्चापकृष्यतेऽपनीयते तावता शौचमिति । तत्र यस्य मलस्य गन्धमात्रं तस्य तदपकर्षणम् । यस्य गन्धो लेपश्च तस्य तदुभयापकर्षणम् ॥ ४५ ॥

शरीर के मलों (से दूषित पदार्थ) की शुद्धि उनके लेप और गन्ध को दूर करने से होती है ॥ ४५ ॥

तदद्भिः पूर्वं मृदा च ॥ ४६ ॥

तत्पूर्वं गन्धवन्मलापकर्षणमद्भिर्लेपगन्धवन्मलापकर्षणं मृदा चाद्भिश्चेति । इदं हस्तपादादेरमेध्यलिप्तस्य शौचम् । तैजसादिषु विशेषस्य पूर्वमुक्तत्वात् ॥ ४६ ॥