भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

पृष्ठ 77, कुल 360 में से

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पृष्ठ 77

१२ | गौतमधर्मसूत्राणि

तब पहले ( गन्धवाले मल को ) जल से और ( गन्ध तथा लेप वाले मल को ) मिट्टी एवं जल से दूर किया जाता है ॥ ४६ ॥

मूत्रपुरीषस्नेहविस्रंसनाभ्यवहारसंयोगेषु च ॥ ४७ ॥

चकारः पूर्वोक्तसमुच्चये । स्नेहो रेतः । मूत्रपुरीषस्नेहानां विस्रंसनं निरसनम् । अभ्यवहारमव्यवहार्यद्रव्यं तेन संयोगः । एषु निमित्तेषु पूर्ववन्मृदा चाद्भिः शौचमिति ॥ ४७ ॥

मूत्र, पुरीष और वीर्य के त्याग से तथा व्यवहार में न लाई जानेवाली दूषित वस्तुओं के संयोग से होनेवाली अशुद्धि पूर्वोक्त विधि से अर्थात् मिट्टी और जल से दूर होती है ॥ ४७ ॥

यत्र चाऽऽम्नायो विदध्यात् ॥ ४८ ॥

यत्र विषये यच्छौचमाम्नाये विदध्यात्तत्र तदेव भवति । यथा चमसानामुच्छिष्टलिप्तानां मार्जालीयाद्भिः प्रक्षालनमिति ॥ ४८ ॥

वेद में जिस विषय में जैसी शुद्धि का विधान किया गया है उसी विधि से शुद्धि करनी चाहिए ॥ ४८ ॥

अथ गुरूपसदनविधिः—

पाणिना सव्यमुपसंगृह्यानङ्गुष्ठमधीहि भो इत्यामन्त्रयेद् गुरुं तत्र चक्षुर्मनःप्राणोपस्पर्शनं दर्भैः ॥ ४९ ॥

पाणिना स्वेन दक्षिणेन । सव्यमिति विशेषग्रहणाद्दक्षिणेनेति गम्यते । गुरोः सव्यं पादमनङ्गुष्ठमङ्गुष्ठवर्जं गृहीत्वाऽधीहि भो इति गुरुमामन्त्रयेत् । तत्र गुरौ मनश्चक्षुषी च निधायावहितः स्यादिति । प्राणाः शीर्षण्यानीन्द्रियाणि । तेषामात्मीयानामाचमनोक्तक्रमेण दर्भैरुपस्पर्शनं कर्तव्यं माणवकेन ॥ ४९ ॥

ब्रह्मचारी अपने दाहिने हाथ से (गुरु के) बायें पैर को अंगूठा छोड़ते हुए पकड़े और 'अधीहि भोः (श्रीमन्, मुझे पढ़ावें) ऐसा कहकर गुरु को आमन्त्रित करे । वहां गुरु की ओर अपने नेत्र एवं मन लगाकर प्राणों (सिर की इन्द्रियों) का कुश से स्पर्श करे ॥ ४९ ॥

प्राणायामास्त्रयः पञ्चदशमात्राः ॥ ५० ॥

कार्या इति शेषः । जानुपार्श्वतः परिमृज्य त्रुटिमेकां कुर्यात्सैका मात्रा । ताः पञ्चदश पूर्यन्ते यावता कालेन तावन्तं कालं प्राणवायुं धारयेत्स एकः प्राणायामः । ते त्रयः कार्याः ।

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