गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 92, कुल 360 में से
संदर्भ में पढ़ेंसानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि २७
असंनिधौ तद्भार्यापुत्रसब्रह्मचारिभ्यः ॥ ४६ ॥
आचार्यासंनिधाने तद्भार्यादिभ्यो यथासंभवं निवेद्य तैरनुज्ञातो भुञ्जीत ॥ ४६ ॥
गुरु के कहीं दूर होने पर उनकी पत्नी, उनके पुत्र या अपने साथ के ब्रह्मचारियों के समक्ष रखकर (उनका अनुमति मिलने पर भिक्षान्न का भोजन करे) ॥ ४६ ॥
वाग्यतस्तृप्यन्नलोलुप्यमानः संनिधायोदकम् ॥ ४७ ॥
यावद्भुक्ति वाचंयमः । तृप्यन्नन्नदर्शनेन हृष्यन् । अलोलुप्यमानोऽतिस्पृहामकुर्वन् । संनिधायान्तर्भावितण्यर्थः । संनिधाप्येति । उदकमुदकभाजनमिति ॥ ४७ ॥
(भोजन करते समय) मौन रहे, प्रसन्न रहे, लालच न करे और जल का पात्र अपने निकट रखे ॥ ४७ ॥
शिष्यशासनप्रकारमाह—
शिष्यश्शिष्टिरवधेन ॥ ४८ ॥
वधस्ताडनम् । अताडयता गुरुणा भर्त्सनादिभिः शिष्यः शास्यः ॥४८॥
गुरु शिष्य को बिना मारे-पीटे केवल उसकी भर्त्सना करके अनुशासित रखे ॥ ४८ ॥
अशक्तौ रज्जुवेणुविदलाभ्यां तनुभ्याम् ॥ ४९ ॥
यदि भर्त्सनादिभिः शासितुमशक्यस्ततो रज्ज्वा तन्वा, तनुना वेणुविदलेन वेति । द्वंद्वनिर्दिष्टयोरपि विकल्पो रज्ज्वा वेणुदलेन वेति मानवे दर्शनात् । ताभ्यां दुर्बलाभ्यां ताडयित्वाऽपि शासनीयः ॥ ४९ ॥
यदि भर्त्सना से (उद्दण्ड शिष्य) वश में न रहे तो पतली रस्सी या बाँस की पतली छड़ी से मारकर (अनुशासित रखे) ॥ ४९ ॥
अन्येन घ्नन् राज्ञा शास्यः ॥ ५० ॥
हस्तादिना क्रोधवशेन ताडयन्नराज्ञा शास्य आचार्यः । एवं शिष्यस्य गुरुकुले वास उक्तः॥ ५० ॥
अन्य किसी प्रकार से (क्रोधवश होकर हाथ आदि से शिष्य को) मारने पर (आचार्य) राजा द्वारा दण्डनीय होता है ॥ ५० ॥