भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 360 में से

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पृष्ठ 91

२६ | गौतमधर्मसूत्राणि

पातकी और पतित ( अपने कर्म से च्युत ) व्यक्तियों को छोड़कर सभी वर्णों ( के गृहस्थों के घर ) से भिक्षा मांगकर लाये ॥ ४१ ॥

आदिमध्यान्तेषु भवच्छब्दः प्रयोज्यो वर्णानुक्रमेण ॥४२॥

भिक्षां देहीति पदद्वयस्याऽऽदिमध्यान्तेषु वर्णक्रमेण भवच्छब्दः संबुद्ध्यन्तः प्रयोक्तव्यः । स्त्रीषु स्त्रीलिङ्गः । ब्राह्मणस्य भवन्भिक्षां देहि । ब्राह्मण्यां भवति भिक्षां देहि । क्षत्रियस्य भिक्षां भवन्देहि । भिक्षां भवति देहि । वैश्यस्य भिक्षां देहि भवन् । भिक्षां देहि भवति ॥ ४२ ॥

( भिक्षा माँगते समय भिक्षा देने वाले के ब्राह्मण क्षत्रिय या वैश्य ) वर्ण के अनुसार 'भिक्षां देहि' इन पदों के आदि, मध्य, या अन्त में 'भवत्' ( स्त्री हो तो 'भवति' ) शब्द का प्रयोग करे ॥ ४२ ॥

आचार्यज्ञातिगुरु [ स्वे ] ष्वलाभेऽन्यत्र ॥ ४३ ॥

आचार्य उक्तः । ज्ञातिः पितृव्यादिः सपिण्डः । गुरुर्मातुलादिः । स्वमात्मीयग्रहणम् । अन्यत्र भिक्षाया अभावे, आचार्यादिगृहेषु भैक्ष्यं चरितव्यम् ॥ ४३ ॥

अन्यत्र भिक्षा न मिलने पर आचार्य, अपने सपिण्ड जनों, गुरुजनों ( मामा आदि ) के या अपने घर से भिक्षा मांगे ॥ ४३ ॥

तेषां पूर्वं पूर्वं परिहरेत् ॥ ४४ ॥

तेषामाचार्यादीनां यो यः प्रथमनिर्दिष्टस्तं तं परिहरेत् । अन्यत्रालाभे स्वगृहे, तत्रालाभे गुरुषु, तत्रालाभे ज्ञातिषु, तत्रालाभ आचार्यगृह इति ॥ ४४ ॥

इनमें क्रमशः पहले-पहले वाले को बचावे ( अर्थात् अन्यत्र भिक्षा न मिलने पर अपने घर से माँगे; वहाँ न मिलने पर गुरुजनों के यहाँ माँगे; वहाँ भी न मिलने पर सपिण्डजनों के यहाँ माँगे और कहीं न मिले तब गुरु के घर से भिक्षा माँगे ॥ ४४ ॥

निवेद्य गुरवेऽनुज्ञातो भुञ्जीत ॥ ४५ ॥

इदमानीतं भैक्ष्यमिति गुरवे निवेद्य तदनुज्ञातो भुञ्जीत । यदि गुरुः स्वयं गृह्णीयात्ततोऽन्यदाहरेत् ॥ ४५ ॥

मिली हुई भिक्षा को गुरु के सम्मुख प्रस्तुत करे और उनकी आज्ञा मिलने पर ही उसका भोजन करे । ( यदि गुरु उसे स्वयं ग्रहण करें तो दूसरी भिक्षा माँगकर लानी चाहिए—मिताक्षरा ) ॥ ४५ ॥

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