भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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सानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि २५

अस्यापवादः—

नोच्छिष्टाशनस्नापनप्रसाधनपादप्रक्षालनोन्मर्दनोपसंग्रहणानि ॥ ३८ ॥

उच्छिष्टाशनं भुक्तशेषाशनम् । स्नापनं स्नानोयादिभिः शिरोऽङ्गमर्दनपूर्वकमभिषेकः । प्रसाधनमलंकरणम् । पादप्रक्षालनं प्रसिद्धम् । उन्मर्दनमभ्यङ्गशरीरसंवाहनादि । उपसंग्रहणं व्यत्यस्तपाणिनेत्यादि पूर्वोक्तम् । एतानि गुरोर्भार्यापुत्रेषु च न कर्तव्यानि । अत एवाऽऽचार्ये कर्तव्यानीति सिद्धम् ॥ ३८ ॥

( किन्तु गुरु की पत्नी एवं उनके पुत्रों के विषय में ) उनका जूठा भोजन करना, उन्हें ( जल से शिर आदि को मलते हुए ) स्नान कराना, अलंकृत करना, पैर धोना, शरीर दबाना और ( पूर्वोक्त उपसंग्रहण की विधि से ) दाहिने हाथ से दाहिने और बाएँ हाथ से बायें पैर को छूकर प्रणाम करना—ये कार्य न करे ॥ ३८ ॥

अथोपसंग्रहणस्य प्रतिप्रसवः—

विप्रोष्योपसंग्रहणं गुरुभार्याणाम् ॥ ३९ ॥

विप्रोष्य प्रवासं गत्वा प्रत्यागतेन गुरुभार्याणामुपसंग्रहणं कार्यम् ॥ ३९ ॥

यात्रा से लौटकर आने पर ( पूर्वोक्त उपसंग्रहण के नियमानुसार ) गुरु की पत्नियों के चरण का स्पर्श करे ॥ ३९ ॥

तत्रापि—

नैके युवतीनां व्यवहारप्राप्तेन ॥ ४० ॥

एके त्वाचार्या युवतीनां गुरुभार्याणां व्यवहारप्राप्तेन षोडशवर्षप्रायेण शिष्येण विप्रोष्याप्युपसंग्रहणं न कार्यमिति मन्यन्ते ॥ ४० ॥

कतिपय आचार्यों का मत है कि ( यात्रा से लौटकर आने पर भी ) युवक ( प्रायः सोलह वर्ष की आयु वाले ) शिष्य को युवती गुरुपत्नियों का चरण नहीं छूना चाहिए ॥ ४० ॥

अग्नीन्धनभैक्ष्यचरण इत्युक्तम् । तत्राग्नीन्धनस्य प्रतिगृहं व्यवस्थितत्वात्साधारणभैक्ष्यचरणे विधिमाह—

सार्ववर्णिकभैक्ष्यचरणमभिशस्तपतितवर्जम् ॥ ४१ ॥

सर्वेषु वर्णेषु भवं सार्ववर्णिकम् । अभिशस्तान्पतितांश्च वर्जयित्वा सर्वेषु वर्णेषु भैक्ष्यं चरितव्यम् । अभिशस्ता उपपातकिनः ॥ ४१ ॥

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