भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 360 में से

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पृष्ठ 89
२४गौतमधर्मसूत्राणि

अधःस्थानासनस्तिर्यग्वातसेवायां गुरुदर्शने चोत्तिष्ठेत् ॥ ३२ ॥

यदा गुरुर्नीचैः स्थानमासनं चाधितिष्ठति स्वयमुच्चैःस्थानासनस्थस्तदा गुरुं दृष्ट्वोत्तिष्ठेत् । तिर्यग्वातसेवायां मूत्रपुरीषोत्सर्गादौ च गुरुं दृष्ट्वोत्तिष्ठेत् । चकारः पूर्वापेक्षया समुच्चयार्थः ॥ ३२ ॥

गुरु को ( अपनी अपेक्षा ) नीचे स्थान या आसन पर स्थित और मूत्र या मलत्याग के समय गुरु को देखकर खड़े हो जाना चाहिए ॥ ३२ ॥

गच्छन्तमन्व्रजेत् ॥ ३३ ॥

गच्छन्तं गुरुमनुगच्छेत् ॥ ३३ ॥

( गुरु के ) चलने पर उनके पीछे-पीछे चले ॥ ३३ ॥

कर्म विज्ञाप्याऽऽख्याय ॥ ३४ ॥

यत्किंचिदस्य शिष्यस्य कर्तव्यं तस्य निष्कृतिरिदं करिष्यामीत्याचार्याय विज्ञाप्य यच्चाऽऽचार्यो( यों )पयिकमुदकुम्भहरणादि तत्स्वयमेव ज्ञात्वा कृत्वा च तस्मै कृतमित्याख्याय वर्तितव्यमित्यर्थः ॥ ३४ ॥

जो कर्म करना हो उसे तथा जो कुछ कार्य कर चुका हो उसे गुरु को बतलावे ॥ ३४ ॥

आहूतोऽध्यायी ॥ ३५ ॥

गुरुणाऽऽहूतः सन्नधीयीत न तु स्वयं चोदयेदिति ॥ ३५ ॥

गुरु के बुलाने पर अध्ययन के लिये जाये ( उन्हें स्वयं प्रेरित न करे ) ॥ ३५ ॥

युक्तः प्रियहितयोः ॥ ३६ ॥

आचार्यस्य यत्प्रियं हितं च तत्र युक्तस्तत्परः स्यात् । प्रियं तत्कालप्रीतिकरम् । हितं कालान्तरे* तत्करम् ॥ ३६ ॥

आचार्य को प्रसन्न करने वाले एवं उनका हित करने वाले कर्मों में तत्पर रहे ॥ ३६ ॥

तद्भार्यापुत्रेषु चैवम् ॥ ३७ ॥

तस्याऽऽचार्यस्य भार्यापुत्राश्च तेषु चैवमाचार्यवद्वर्तितव्यम् ॥ ३७ ॥

आचार्य की पत्नी एवं उनके पुत्रों से ( आचार्य के ) समान ही व्यवहार करे ॥ ३७ ॥

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