भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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सानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि ३३

भिक्षार्थी ग्राममियात् ॥ १३ ॥

भिक्षाकाल एव ग्रामं प्रविशेत् । शेषकालं देवालयादौ वृक्षमूलेषु वा वसेत् ॥ १३ ॥

भिक्षा माँगने के लिये ( ही ) गाँव में जाये ॥ १३ ॥

जघन्यमनिवृत्तं चरेत् ॥ १४ ॥

भिक्षाकाले यद्गृहमनुपपत्त्या विलम्बितं न तद्भूयस्तदहः प्रविशेत् ।

तत्र मनुः—

विधूमे सन्नमुसले व्यङ्गारेऽभुक्तवज्जने ।
वृत्ते शरावसंपाते भिक्षां नित्यं यतिश्चरेत् ॥ १४ ॥

भिक्षा के समय किसी घर में देर हो जाय तो बिना लौटे ही भिक्षा ग्रहण करे ( दुबारा न जावे ) ॥ १४ ॥

निवृत्ताशीः ॥ १५ ॥

अधिकभिक्षालाभार्थं गृहेष्वाशीर्वादपरो न स्यात् ॥ १५ ॥

अधिक भिक्षा के लोभ से आशीर्वाद नहीं देना चाहिए ॥ १५ ॥

वाक्चक्षुःकर्मसंयतः ॥ १६ ॥

वाक्संयमो मौनम् । चक्षुःसंयमः पदविक्षेपप्रदेशादन्यत्र चक्षुषोरप्रवर्तनम् । कर्मसंयमो भिक्षोश्चोदितकर्मानतिक्रमः । अत्र वाक्संयमविरोधे तु स्मृत्यन्तरम्—

धर्मयोगं पथिप्रश्नं स्वाध्यायं च तथैव च ।
भिक्षार्थं देहिवचनं न निन्दति यतेरपि ॥ इति ॥ १६ ॥

वाणी, नेत्र और कर्म में संयम करे ( अर्थात् अधिक न बोले, इधर-उधर न देखे और विहित कर्म के अतिरिक्त कर्म न करे ) ॥ १६ ॥

कौपीनाच्छादनार्थं वासो बिभृयात् ॥ १७ ॥

कौपीनमिति गुह्यप्रदेशस्य नाम । तदाच्छाद्यते यावता तावदेव वासो बिभृयात् । अधिकं तु प्रावरणादि न बिभृयात् ॥ १७ ॥

केवल गुप्त अंगों के आच्छादन भर के लिये पर्याप्त वस्त्र धारण करे ॥ १७ ॥

प्रहीणमेके निर्णिज्य ॥ १८ ॥

एके मन्यन्ते तदपि कौपीनाच्छादनं प्रहीणं जीर्णं तथाऽन्यैस्त्यक्तं प्रक्षाल्य बिभृयात् ॥ १८ ॥

३ गौ० ध०