भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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[घ] श्रीगीतगोविन्दम् जीवनलीलाका अनुशीलन करने पर यह देखा जाता है कि श्रीजयदेव गोस्वामी अनन्त कोटि ब्रह्माण्डके अधीश्वर श्रीब्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दरके मुखसे कैसे यह बात कहलावें। ऐसा सोचकर वे अत्यन्त अस्थिर और व्याकुल हो उठे। कितनी ही बार ऐसा लिखूँ, लिखूँ, अभिलाषा करके भी यह चरण (चतुर्थ) किसी प्रकार भी लिखनेमें समर्थ नहीं हुए। वे श्रीकृष्णको स्वयं-भगवान् समझते थे। इस ऐश्वर्यभावके कारण ही वे ऐसा नहीं लिख सके। किन्तु भक्तवत्सल भगवान्‌ने स्वयं उनका वेश धारणकर अपने हस्तसे स्वर्णाक्षरोंमें उस चतुर्थ चरणको “देहि पदपल्लवमुदारं” लिखकर पूरा कर दिया और साथ ही साथ अपने भक्तवात्सल्यकी बात दुंदुभिवाद्यकी भाँति सर्वत्र घोषणा कर दी। कलिपावनावतार श्रीचैतन्य महाप्रभु गम्भीरामें बैठकर श्रीस्वरूप दामोदर एवं रामानन्दरायके साथ एकान्त निर्जन गम्भीरामें जिन कतिपय रसग्रन्थोंका रसास्वादन करके आनन्दमें विह्वल हो उठते थे, श्रीजयदेव गोस्वामीका गीतगोविन्द उनमेंसे अन्यतम एक है। श्रील कविराज गोस्वामीके मुखसे ही हम इस विषयको जानते हैं— चण्डीदास विद्यापति, रायेर नाटक गीति कर्णामृत श्रीगीतगोविन्द। स्वरूप-रामानन्द-सने, महाप्रभु रात्रिदिने गाय सुने परम-आनन्द॥ इसमें कुछ ऐसे गम्भीर भाव हैं, जिनकी हम विशेषरूपसे चिन्ता कर सकते हैं। श्रीचैतन्यमहाप्रभु स्वयं भक्तिका आचरणकर भक्तिकी शिक्षा देनेके लिए अवतीर्ण हुए हैं। वे ऐसे निर्जन और गोपनीय गम्भीरामें मात्र दो-एक अपने अन्तरङ्ग भक्तोंको लेकर इन सब ग्रन्थोंका अनुशीलन- रसास्वादन क्यों करते थे? यहाँ भी उसी अधिकारकी बात कही गयी है। अधिकन्तु इन सब रसग्रन्थोंका अनुशीलन