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गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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प्रस्तावना [ग] आत्मेन्द्रिय-प्रीति-इच्छा तारे बलि 'काम'। कृष्णेन्द्रिय-प्रीति-इच्छा धरे 'प्रेम' नाम॥ कामेर तात्पर्य-निज संभोग केवल। कृष्णसुख-तात्पर्य-प्रेम महाबल॥" तात्पर्य यह है कि लौकिक काम और अप्राकृत प्रेम-इन दोनोंके लक्षण अलग-अलग हैं। लौकिक काम लोहेके समान है तथा अप्राकृत प्रेम सोनेके समान है। अपनी इन्द्रियोंके लिए सुखकर स्पृहाको काम कहते हैं। किन्तु श्रीकृष्णोन्द्रिय-प्रीतिको विशुद्ध प्रेम कहते हैं। केवल अपना संभोग ही कामका तात्पर्य है और श्रीकृष्णको सुखी बनाना ही महाबलवान प्रेमका उद्देश्य होता है। श्रील कविराज गोस्वामीके इस गम्भीर आशयको कितने लोग समझनेमें समर्थ हैं? विशेषकर जो अपने इन्द्रियतर्पणमें ही सदा व्यस्त हैं, वे इसे समझ नहीं सकते हैं। इसीलिए श्रीराधाकृष्णके अप्राकृत प्रेमकी लीला भी उनके निकट कामवासनाके खेलके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। यदि वे श्रीराधाजी एवं उनकी सखियोंके समान लोकधर्म, वेदधर्म, देहधर्म इत्यादिको सर्वथा त्यागकर किसीको प्रेम कर पाते, तो वे इन लीलाओंकी तत्त्वकथासे एकदिन अवश्य अवगत हो पाते; क्योंकि ऐसा होनेपर ही वे समझ सकते कि आत्मसुखकी कामना नहीं रखकर भी निस्वार्थ प्रेम किया जा सकता है। इसी निःस्वार्थ अप्राकृत प्रेमकी शिक्षा देनेके लिए ही वैष्णव कविगण लेखनीको धारण करते हैं। कविकेशरी श्रीजयदेवने भी यही किया है; क्योंकि स्वयं-भगवान् श्रीकृष्ण इस निःस्वार्थ अप्राकृत प्रेमके वशीभूत हो जाते हैं। वे इतने वशीभूत हो जाते हैं कि जहाँ भी वे ऐसी प्रीतिकी गन्ध पा लेते हैं, वे उनके चरणोंमें गिरकर 'देहि पदपल्लवमुदारं' कहनेके लिए भी प्रस्तुत रहते हैं। श्रीजयदेव कविकी