भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 8, कुल 448 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 8

[ख] श्रीगीतगोविन्दम् मधुर-कोमल-कान्त पदावलीं शृणु तदा जयदेव-सरस्वतीम् ॥ अर्थात् उन्होंने कहा है कि श्रीहरिकी सुखद स्मृतिकी यदि मनमें इच्छा हो अथवा यदि तुम हरिका प्रीतिपूर्वक स्मरण करना चाहते हो अथवा श्रीहरिके विलास-नैपुण्यको जाननेका हृदयमें कौतूहल हो, तो तुम इस ग्रन्थका पाठ करो, अन्यथा तुम इस ग्रन्थका पाठ मत करो। मेरी यह कोमलकान्त पदावली तुम्हारे निकट जितनी भी मधुर और कोमल हो, तुम अनधिकारी इसका पाठ मत करो। यदि तुम्हारे हृदयमें कौतूहल हो और उनके रासविलासको जाननेकी इच्छा हो, तो मेरी कोमलकान्त पदावली तुम्हारे निकट बहुत ही मधुर, कोमल और अत्यन्त कमनीय विवेचित होगी। इतना स्पष्ट करनेके बाद भी अनधिकारियोंके निकट श्रीजयदेव कवि पार नहीं पा सके। उनके मधुर एवं अलंकृत भाषाके आकर्षणके कारण वे इस ग्रन्थका पाठ करते हैं और अन्तमें उसका यथार्थ भावार्थ या मर्म ग्रहण करनेमें असमर्थ होकर अभद्रकी भाँति कविकुल चूड़ामणि श्रीजयदेवको ही गालीगलौज करते हैं। ऐसा तो होगा ही। वे तो श्रीहरिको नहीं पहचानते, वे हरिकी मधुर स्मृतिके निकट भी जाना नहीं चाहते। वे केवल स्वयंको समझते हैं। वह भी देहेन्द्रियात्मक स्वयंको समझते हैं। वे अपने शरीर और इन्द्रियोंको सुखकर समझकर उसे ही चरम सुख मानते हैं। वैसे कामके किंकर-जन श्रीजयदेव गोस्वामी द्वारा वर्णित अप्राकृत प्रेमके व्यापारको क्या समझेंगे? इसलिए परम पूज्यनीय श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने श्रीचैतन्यचरितामृतमें कहा है— “काम प्रेम दोंहाकार विभिन्न लक्षण। लौह आर हेम जैछे स्वरूप-विलक्षण ॥