गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
[ख] श्रीगीतगोविन्दम् मधुर-कोमल-कान्त पदावलीं शृणु तदा जयदेव-सरस्वतीम् ॥ अर्थात् उन्होंने कहा है कि श्रीहरिकी सुखद स्मृतिकी यदि मनमें इच्छा हो अथवा यदि तुम हरिका प्रीतिपूर्वक स्मरण करना चाहते हो अथवा श्रीहरिके विलास-नैपुण्यको जाननेका हृदयमें कौतूहल हो, तो तुम इस ग्रन्थका पाठ करो, अन्यथा तुम इस ग्रन्थका पाठ मत करो। मेरी यह कोमलकान्त पदावली तुम्हारे निकट जितनी भी मधुर और कोमल हो, तुम अनधिकारी इसका पाठ मत करो। यदि तुम्हारे हृदयमें कौतूहल हो और उनके रासविलासको जाननेकी इच्छा हो, तो मेरी कोमलकान्त पदावली तुम्हारे निकट बहुत ही मधुर, कोमल और अत्यन्त कमनीय विवेचित होगी। इतना स्पष्ट करनेके बाद भी अनधिकारियोंके निकट श्रीजयदेव कवि पार नहीं पा सके। उनके मधुर एवं अलंकृत भाषाके आकर्षणके कारण वे इस ग्रन्थका पाठ करते हैं और अन्तमें उसका यथार्थ भावार्थ या मर्म ग्रहण करनेमें असमर्थ होकर अभद्रकी भाँति कविकुल चूड़ामणि श्रीजयदेवको ही गालीगलौज करते हैं। ऐसा तो होगा ही। वे तो श्रीहरिको नहीं पहचानते, वे हरिकी मधुर स्मृतिके निकट भी जाना नहीं चाहते। वे केवल स्वयंको समझते हैं। वह भी देहेन्द्रियात्मक स्वयंको समझते हैं। वे अपने शरीर और इन्द्रियोंको सुखकर समझकर उसे ही चरम सुख मानते हैं। वैसे कामके किंकर-जन श्रीजयदेव गोस्वामी द्वारा वर्णित अप्राकृत प्रेमके व्यापारको क्या समझेंगे? इसलिए परम पूज्यनीय श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने श्रीचैतन्यचरितामृतमें कहा है— “काम प्रेम दोंहाकार विभिन्न लक्षण। लौह आर हेम जैछे स्वरूप-विलक्षण ॥
प्रस्तावना [ग] आत्मेन्द्रिय-प्रीति-इच्छा तारे बलि 'काम'। कृष्णेन्द्रिय-प्रीति-इच्छा धरे 'प्रेम' नाम॥ कामेर तात्पर्य-निज संभोग केवल। कृष्णसुख-तात्पर्य-प्रेम महाबल॥" तात्पर्य यह है कि लौकिक काम और अप्राकृत प्रेम-इन दोनोंके लक्षण अलग-अलग हैं। लौकिक काम लोहेके समान है तथा अप्राकृत प्रेम सोनेके समान है। अपनी इन्द्रियोंके लिए सुखकर स्पृहाको काम कहते हैं। किन्तु श्रीकृष्णोन्द्रिय-प्रीतिको विशुद्ध प्रेम कहते हैं। केवल अपना संभोग ही कामका तात्पर्य है और श्रीकृष्णको सुखी बनाना ही महाबलवान प्रेमका उद्देश्य होता है। श्रील कविराज गोस्वामीके इस गम्भीर आशयको कितने लोग समझनेमें समर्थ हैं? विशेषकर जो अपने इन्द्रियतर्पणमें ही सदा व्यस्त हैं, वे इसे समझ नहीं सकते हैं। इसीलिए श्रीराधाकृष्णके अप्राकृत प्रेमकी लीला भी उनके निकट कामवासनाके खेलके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। यदि वे श्रीराधाजी एवं उनकी सखियोंके समान लोकधर्म, वेदधर्म, देहधर्म इत्यादिको सर्वथा त्यागकर किसीको प्रेम कर पाते, तो वे इन लीलाओंकी तत्त्वकथासे एकदिन अवश्य अवगत हो पाते; क्योंकि ऐसा होनेपर ही वे समझ सकते कि आत्मसुखकी कामना नहीं रखकर भी निस्वार्थ प्रेम किया जा सकता है। इसी निःस्वार्थ अप्राकृत प्रेमकी शिक्षा देनेके लिए ही वैष्णव कविगण लेखनीको धारण करते हैं। कविकेशरी श्रीजयदेवने भी यही किया है; क्योंकि स्वयं-भगवान् श्रीकृष्ण इस निःस्वार्थ अप्राकृत प्रेमके वशीभूत हो जाते हैं। वे इतने वशीभूत हो जाते हैं कि जहाँ भी वे ऐसी प्रीतिकी गन्ध पा लेते हैं, वे उनके चरणोंमें गिरकर 'देहि पदपल्लवमुदारं' कहनेके लिए भी प्रस्तुत रहते हैं। श्रीजयदेव कविकी
[घ] श्रीगीतगोविन्दम् जीवनलीलाका अनुशीलन करने पर यह देखा जाता है कि श्रीजयदेव गोस्वामी अनन्त कोटि ब्रह्माण्डके अधीश्वर श्रीब्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दरके मुखसे कैसे यह बात कहलावें। ऐसा सोचकर वे अत्यन्त अस्थिर और व्याकुल हो उठे। कितनी ही बार ऐसा लिखूँ, लिखूँ, अभिलाषा करके भी यह चरण (चतुर्थ) किसी प्रकार भी लिखनेमें समर्थ नहीं हुए। वे श्रीकृष्णको स्वयं-भगवान् समझते थे। इस ऐश्वर्यभावके कारण ही वे ऐसा नहीं लिख सके। किन्तु भक्तवत्सल भगवान्ने स्वयं उनका वेश धारणकर अपने हस्तसे स्वर्णाक्षरोंमें उस चतुर्थ चरणको “देहि पदपल्लवमुदारं” लिखकर पूरा कर दिया और साथ ही साथ अपने भक्तवात्सल्यकी बात दुंदुभिवाद्यकी भाँति सर्वत्र घोषणा कर दी। कलिपावनावतार श्रीचैतन्य महाप्रभु गम्भीरामें बैठकर श्रीस्वरूप दामोदर एवं रामानन्दरायके साथ एकान्त निर्जन गम्भीरामें जिन कतिपय रसग्रन्थोंका रसास्वादन करके आनन्दमें विह्वल हो उठते थे, श्रीजयदेव गोस्वामीका गीतगोविन्द उनमेंसे अन्यतम एक है। श्रील कविराज गोस्वामीके मुखसे ही हम इस विषयको जानते हैं— चण्डीदास विद्यापति, रायेर नाटक गीति कर्णामृत श्रीगीतगोविन्द। स्वरूप-रामानन्द-सने, महाप्रभु रात्रिदिने गाय सुने परम-आनन्द॥ इसमें कुछ ऐसे गम्भीर भाव हैं, जिनकी हम विशेषरूपसे चिन्ता कर सकते हैं। श्रीचैतन्यमहाप्रभु स्वयं भक्तिका आचरणकर भक्तिकी शिक्षा देनेके लिए अवतीर्ण हुए हैं। वे ऐसे निर्जन और गोपनीय गम्भीरामें मात्र दो-एक अपने अन्तरङ्ग भक्तोंको लेकर इन सब ग्रन्थोंका अनुशीलन- रसास्वादन क्यों करते थे? यहाँ भी उसी अधिकारकी बात कही गयी है। अधिकन्तु इन सब रसग्रन्थोंका अनुशीलन
प्रस्तावना [ङ] करनेके लिए स्थानकी बात भी अभिव्यक्त हुई है। श्रीमन्महाप्रभु साधारण स्थानमें साधारण लोगोंके समाजमें जो संकीर्तन करते, वह केवल नामसंकीर्तन तथा रससंकीर्तन गम्भीरा (गुप्त-गृह) में केवल श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी एवं राय रामानन्दके साथ ही करते। श्रीधाम नवद्वीपमें भी यही नियम था। वहाँ भी संकीर्तन होता था। किन्तु रातमें श्रीनिवासके घरमें द्वार बन्द करके होता था। जगद्गुरु श्रीगौराङ्गदेवकी यही सर्वश्रेष्ठ शिक्षा है। अधिकारी होकर इस ग्रन्थका गुप्तरूपसे अनुशीलन करो। इससे तुम्हारा परम कल्याण होगा और प्रेमभक्तिके अधिकारी होओगे। अन्यथा भक्त और भगवान्के निकट अपराधी होकर तुम अधःपतित हो जाओगे। भगवान् श्रीकृष्ण शक्तिमान् हैं और श्रीमती राधिका उनकी पराशक्ति हैं।^{(१)} श्रीराधिका एवं श्रीकृष्णकी लीला—शक्ति और शक्तिमानकी लीला है। कामगन्धहीन अप्राकृत प्रेमकी लीला है। यह बात तो बहुतसे लोग जानते हैं एवं जिन ग्रन्थोंमें यह लोकपावनी लीला लिपिबद्ध हुई है, भक्ति अनुष्ठानके अङ्गके रूपमें उसका वे अनुशीलन भी करना चाहते हैं। किन्तु संस्कृत भाषामें अनभिज्ञ होनेके कारण उसका भावार्थके साथ पाठ नहीं कर पाते। श्रीगीतगोविन्दका वर्तमान संस्करण उनके अर्थबोध और भावबोध दोनोंमें यथेष्ट सहायता करेगा। (१) सच्चिदानन्द पूर्ण कृष्णेर स्वरूप। एकई चिच्छक्ति तार धरे तिन रूप॥ आनन्दांशे ह्लादिनी सदंशे सन्धिनी। चिदंशे संवित् जारे ज्ञान करि जानि॥ ह्लादिनीर सार प्रेम, प्रेमसार भाव। भावेर पराकाष्ठा—नाम महाभाव॥ महाभाव-स्वरूपा श्रीराधा ठाकुरणी। सर्वगुणखनि कृष्णकान्ता-शिरोमणि॥
[च] श्रीगीतगोविन्दम् श्रीगीतगोविन्द आजकल शिक्षित समाजमें शृंगाररसात्मक सुमधुर काव्यके रूपमें ही प्रसिद्ध है और उसके प्रणेता पूज्यपाद श्रीजयदेव गोस्वामी एक असाधारण कविके रूपमें हैं। परन्तु श्रीगीतगोविन्द काव्य होनेपर भी केवल छन्दोबद्ध रसात्मक वाक्यस्वरूप लोकप्रसिद्ध आलंकारिक काव्य नहीं है। जयदेव गोस्वामी स्वयं कवि होनेपर भी सुमधुर पदविन्यास करनेमें कुशल रचनाकार और स्वभाव विकासक केवल कविमात्र नहीं हैं। श्रीगीतगोविन्द सर्ववेदका सार एवं श्रीजयदेव गोस्वामी सर्ववेद विशारद परम साधक और सिद्ध भी हैं। पाठकगण श्रीगीतगोविन्दका पाठ करनेसे पूर्व या आरम्भमें यह देखेंगे कि ग्रन्थकारने अपने इष्टदेवताके स्मरणरूप मङ्गलाचरणमें यही लिखा है— “राधा-माधवयो र्जयन्ति यमुनाकूले रहः केलयः।” अर्थात् श्रीयमुनापुलिनमें श्रीराधामाधवकी गम्भीर एवं सुगूढ़ विहारलीला सर्वोपरि विराजमान हो रही है। द्वितीय श्लोकमें उनके वर्णनीय विषयका परिचय दिया है— “श्रीवासुदेव-रतिकेलि-कथा-समेतमेतं करोति जयदेव-कविः प्रबन्धम्॥” अर्थात् जयदेव कवि श्रीवासुदेव व्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दरकी परम आनन्दमय रतिविहारका अवलम्बन करके यह प्रबन्ध लिख रहे हैं। जैसा कि हमने पहले कहा है, तृतीय श्लोकमें उन्होंने इस ग्रन्थका अधिकारी भी निर्णय किया है— यदि हरिस्मरणे सरसं मनो यदि विलासकलासु कुतूहलम्। मधुर-कोमल-कान्त-पदावलीं शृणु तदा जयदेव सरस्वतीम्॥ अर्थात् यदि हरि स्मरण करनेमें मनको अनुरक्त करना चाहते हो अथवा तुम्हारा मन हरिस्मरणमें अनुरक्त है और यदि उस लीलारसको आस्वादन करनेका कौतूहल हो अर्थात्
प्रस्तावना [छ] यदि एकान्तिक अभिलाषा हो तभी सुमधुर कोमलकान्त पदावलीयुक्त जयदेवके अप्राकृत काव्यका श्रवण करो। श्रीजयदेव गोस्वामीने इस अप्राकृत काव्यमें श्रीराधामाधवके अप्राकृत प्रणयका मनोज्ञ (सुन्दर) वर्णन किया है। शृंगाररसके विप्रलम्भ तथा संभोग दोनों पक्षोंका चरमोत्कर्ष इसी गीतिकाव्यमें दृष्टिगोचर होता है। कविकी मान्यता यह है कि विप्रलम्भ द्वारा परिपुष्ट संभोग शृंगार-रसिक, सिद्ध-महापुरुषों एवं भक्तिसाधकोंको अधिक सुखप्रद प्रतीत होता है। अधिकारीके निर्णयके सम्बन्धमें श्रीमद्भगवद्गीताके अट्ठारहवें अध्यायके ६७-६८ श्लोकोंमें स्वयं-भगवान् श्रीकृष्णने अपने अन्तरङ्ग भक्त अर्जुनको गीताके श्रवण एवं कीर्तनका अधिकारी और अनधिकारीका उपदेश दिया है। इदन्ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन। न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥ जो लोग श्रद्धालु नहीं हैं, मेरे प्रति शुद्धभक्ति नहीं है, जो अनधिकारी हैं, ऐसे लोगोंको यह मेरा अत्यन्त रहस्यपूर्ण ज्ञान और विज्ञान उन्हें श्रवण मत कराओ। य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति। भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥ अर्थात् जो लोग मेरे इस परमगुह्यतम गीताके अत्यन्त रहस्यपूर्ण ज्ञान विज्ञानका अत्यन्त श्रद्धालु भक्तोंको श्रवण कराते हैं, इस प्रकार अन्तमें वे मुझे ही प्राप्त होते हैं। इसलिए पहले श्लोकमें अनधिकारी और दूसरे श्लोकमें अधिकारीकी बात की है। श्रीजीवगोस्वामीने भी श्रीगोपालचम्पू सुननेके लिए अनधिकारी और अधिकारीका स्पष्टरूपसे विवेचन करते हुए अनधिकारी, भक्तिरहित, श्रद्धारहित, व्यक्तियोंको उक्त ग्रन्थ पढ़नेके लिए निषेध किया है। श्रीसनातन गोस्वामीने भी बृहद्भागवतामृत नामक ग्रन्थका
[ज] श्रीगीतगोविन्दम् श्रद्धारहित अनधिकारी व्यक्तियोंको पढ़ने-सुननेके लिए निषेध किया है। इसी प्रकार हमारे अन्यान्य गोस्वामियोंने भी स्वरचित ग्रन्थोंको न पढ़नेके लिए निषेध किया है। श्रीगीतगोविन्दकी विषय-वस्तु श्रीजयदेव गोस्वामीने कलियुगकी मानव प्रकृतिको भलीभाँति समझा था। उन्होंने यह समझा था कि कलियुगके मनुष्य बाह्य आवरणके सौन्दर्यको देखकर ही मुग्ध होते हैं। आवरणका सौन्दर्य नहीं देखनेसे अन्तर्निहित परम हितकर औषधकी भी अवहेलना करते हैं। इसीलिए श्रीजयदेव कविने वैष्णवोचित सब जीवोंके प्रति सदय होकर भवरोगकी एकमात्र औषधिस্বরূপ एवं अप्राकृत चिन्मय रसका आस्वादन करनेके लिए अद्वितीय अवलम्बनस्वरूप अप्राकृत परम सुमधुर अपने भावोंको आपात मधुर प्राकृत-शृंगाररसके आवरणमें लपेटकर उसे काव्यके रूपमें प्रकाश किया है। पाठकगण अब अच्छी तरहसे समझ सकते हैं कि श्रुतिमें जो रस जीवके स्थिर आनन्दका हेतु निर्दिष्ट हुआ है, श्रीगीतगोविन्द उसी अप्राकृत सुमधुर रसका काव्य है। प्राकृत शृंगाररसका यह काव्य नहीं है। इसीलिए यह काव्य होने पर भी अखिल श्रुतियोंका सार स्वरूप है। रसतत्त्वविद् कविकुल-तिलक श्रीजयदेव गोस्वामीने कभी श्रीकृष्णके विरहमें श्रीराधाको उत्कृष्ट अभिमानके द्वारा ईर्ष्यान्वित किया है, कभी निदारुण दुःखसे अविश्रान्त क्रन्दन कराया है, कभी श्रीराधाके विरहमें श्रीभगवान्को भी अत्यन्त व्याकुल कर दिया है। केवल यही नहीं, स्वयं-भगवान् ब्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दरको श्रीराधाजीके चरणोंको पकड़कर 'देहि पदपल्लवमुदारं' ऐसा कहलाया है। इसीमें भक्तोंको अत्यन्त उन्नत भगवत् प्रेम और भगवान्का चूड़ान्त भक्तवात्सल्य
प्रस्तावना [झ] प्रकटित हुआ है। यही अखिल श्रुतियोंका सार स्वरूप है। श्रुतियोंने कहा है कि वे परमात्मा जिसको चाहते हैं वही उनको प्राप्त होते हैं- नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥ (कठ १/२/२३) भगवान् श्रीकृष्ण आनन्दघनमूर्त्ति हैं। जीव भी सब समय केवल आनन्दका ही अनुसन्धान कर रहा है, उसे प्राप्त नहीं कर पा रहा है। किन्तु जिस दिन जीवोंका ऐसा सौभाग्य उदित होगा, उसी दिन अर्थात् जिस समय भक्तोंके अन्तर्निहित भावोंको देखकर भगवान् स्वयं अपनेको ज्ञात करा देंगे, उसी दिन अपने सौभाग्यके बलसे स्वयं आनन्द भी उनका अनुसन्धान करेगा। साधक भक्त अपने हृदयमें कृष्णाकर्षणी प्रेमभक्ति संचयकर अपने घरमें बैठा रहेगा और प्रेमलोलुप आनन्दमय श्रीकृष्ण उसके निकट जानेके लिए परम व्याकुल हो उठेंगे। अपराधीकी भाँति अनुनय विनय करेंगे-देहि पदपल्लवमुदारं। यही निखिल श्रुतियोंका सार स्वरूप है। श्रुतियाँ कहती हैं-ब्रह्म जितना निकट है उतना दूर भी है। श्रीगीतगोविन्दके काव्य-तत्त्वकी आलोचना श्रीजयदेव कविने इस मधुर-काव्यमें गान्धर्व-विद्याका कौशल, ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीश्यामसुन्दरके चिन्तन-स्मरणका समस्त रहस्य, सम्भोग और विप्रलम्भ दोनों प्रकारके शृंगाररसका विस्तृत विवेचन तथा काव्य-प्रणयकी प्राचीन पद्धति, सभीका मणिकाञ्चन न्यायसे सन्निवेश किया है। उन्होंने स्वयं कहा है—'सानन्दाः परिशोधयन्तु सुधियः श्रीगीतगोविन्दतः' (१२/२४/११) इस चतुर्थ चरणका यह भी अभिप्राय है कि इन समस्त
[ञ] श्रीगीतगोविन्दम् वस्तुओंका पूर्णतः शुद्धरूप इस गीतगोविन्द काव्यमें ही एकमात्र उपलब्ध हो सकता है। अतएव विद्वानोंको चाहिए कि वे इस काव्यको भलीभाँति परीक्षण करके देखें और जानें भी। श्रीजयदेव कविको इस बातका दृढ़ विश्वास है कि श्रीगीतगोविन्द-काव्यके माधुर्यके सामने अंगूरकी मदिरा, चीनीकी मिठास, पके आम्रफल तथा कामिनीके अधररस-ये सब उपेक्षणीय हैं; क्योंकि इस शृंगारकाव्यमें शृंगाररसका सम्पूर्ण सार समाविष्ट है। साध्वी! माध्वीक चिन्ता न भवति भवति शर्करे! कर्कशासि, द्राक्षे! द्रक्ष्यन्ति के त्वाममृत! मृतमसि क्षीर! नीरं रसस्ते। माकन्द! क्रन्द कान्ताधर! धर न तुलां गच्छ यच्छन्ति भावं, यावच्छृङ्गारसारं शुभमिव जयदेवस्य वैदग्ध्यवाचः ॥ इस काव्यमें श्रीजयदेव गोस्वामीने विभिन्न छन्द, रस अलंकार और औचित्योंका सन्निवेश किया है। श्रीराधामाधव- विलासका मधुर गायन ही कविका प्रमुख ध्येय है। इस काव्यकी चौब्बीस अष्टपदियोंके माध्यमसे कविने संगीतशास्त्र तथा रसशास्त्रके अपने गहन अध्ययनका विशद् परिचय दिया है। प्रत्येक अष्टपदीके भिन्न-भिन्न राग और ताल हैं। लगता है कि श्रीराधामाधवके सम्भोग और वियोगका कविने समाधिकी स्थितिमें साक्षात्कार किया है। गीतगोविन्दमें प्रवेश-प्रणाली कविवर श्रीजयदेव गोस्वामीने श्रीकृष्णके साथ श्रीराधाके सम्मिलनमें एक सखीको मध्यवर्तिनी रखा है। सखीके अनुगत हुए बिना तथा उनकी सहायता प्राप्त किये बिना श्रीकृष्णको प्राप्त नहीं किया जा सकता। यही समस्त भक्तिशास्त्रोंका सिद्धान्त है। सखीकी सहायता और गुरुकी सहायता एक ही बात है। गुरु होनेके लिए सखीभाव
प्रस्तावना [ट] अवलम्बन करना होता है और श्रीकृष्णको पानेके लिए सखीभावापन्न सद्गुरुका आश्रय ग्रहण करना होता है। यही अखिल श्रुतियोंका सार है। श्रुतियोंने कहा है- तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम्। शाब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाश्रयम् ॥ (श्रीमद्भागवत ११/३/२१) अर्थात् ब्रह्मको जाननेके लिए ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरुका आश्रय करना होता है। नैमिषारण्य नामक पुण्यारण्यमें श्रीसूत गोस्वामीने श्रीमद्भागवतका पाठ करते समय श्रीमद्भागवतको ही अखिल श्रुतिसार बताया है। श्रीमद्भागवतका सार रासलीला है। सारदर्शी कविवर श्रीजयदेव गोस्वामीने कृपापरवश होकर उसी सारादपि सार श्रीमद्भागवतोक्त श्रीरासलीलाको निचोड़कर गागरमें सागर भरकर कलिजीवोंकी स्वतः प्रवृत्तिके लिए श्रीगीतगोविन्द नामक काव्यामृतको प्रकाश किया है। श्रीशुकदेव गोस्वामीने परीक्षित महाराजके प्रश्नके उत्तरमें कहा था- अनुग्रहाय भक्तानां मानुषं देहमाश्रितः। भजते तादृशीः क्रीड़ा याः श्रुत्वा तत्परो भवेत् ॥ अर्थात् भगवान् श्रीकृष्ण अपने भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिए इस प्रकारकी लीलाएँ प्रकाश करते हैं। शृंगाररस-प्रिय अभक्त भी इसे सुनकर क्रमशः श्रीकृष्ण-परायण होंगे। इसके द्वारा यह समझा जा सकता है कि भगवान् श्रीकृष्णने भक्त-अभक्त सभीके प्रति कृपावश होकर इस प्रकार शृंगारप्रिय लीलाको धरणीतल पर प्रकट की है। महर्षि वेदव्यासने सबके प्रति कृपा-परवश होकर उसको लिपिबद्ध किया और परमभक्त श्रीशुकदेव गोस्वामीने भी कृपा-परवश होकर ही पृथ्वीपर इसका प्रचार किया है। उसके पश्चात् कविवर जयदेव गोस्वामीने भी कृपा-परवश होकर और भी मधुरतर काव्यके आकारमें उसे प्रकाशित किया है। श्रीचैतन्यचरितामृतमें श्रीरायरामानन्द संवादमें
[ठ] श्रीगीतगोविन्दम् श्रीरामानन्दके मुखसे श्रीमन्शचीनन्दन गौरहरिके प्रश्नोंके उत्तरमें कहा है— प्रभु कहे,—‘साध्यवस्तुर अवधि’ एइ हय। तोमार प्रसादे इहा जानिलूँ निश्चय॥ ‘साध्यवस्तु’ ‘साधन’ बिना केह नाहि पाय। कृपा करि कह, राय, पावार उपाय॥ राय कहे,—जेइ कहाओ, सेइ कहि वाणी। कि कहिये भाल-मन्द, किछुइ ना जानि॥ त्रिभुवन-मध्ये ऐछे हय कोन धीर। जे तोमार माया-नाटे हइबेक स्थिर॥ मोर मुखे वक्ता तुमि, तुमि हओ श्रोता। अत्यन्त रहस्य, शुन, साधनेर कथा॥ राधाकृष्णेर लीला एइ अति गूढ़तर। दास्य-वात्सल्य-भावे ना हय गोचर॥ सबे एक सखीगणेर इहा अधिकार। सखी हइते हय एइ लीलार विस्तार॥ सखी बिना एइ लीला पुष्ट नाहि हय। सखी लीला विस्तारिया, सखी आस्वादय॥ सखी बिना एइ लीलाय अन्येर नाहि गति। सखीभावे जे ताँरे करे अनुगति। राधाकृष्ण-कुञ्जसेवा-साध्य सेइ पाय। सेइ साध्य पाइते आर नाहिक उपाय॥ तात्पर्य यह है कि श्रीराय रामानन्दके मुखसे साध्य वस्तुके सम्बन्धमें सुनकर श्रीचैतन्य महाप्रभुने कहा—"यहीं तक साध्य वस्तुकी सीमा और अवधि है। तुम्हारी कृपासे मैं यह सब अच्छी तरहसे जान गया। किन्तु यह अत्यन्त गम्भीर साध्य-वस्तु बिना साधनके कोई नहीं पा सकता। हे राय! आप कृपा करके इसको प्राप्त करनेका उपाय बतलाइये।” रायजीने कहा—"आप जो कुछ हमारे हृदयमें
प्रस्तावना [ड] प्रेरणा करते हैं, वही मैं कहता हूँ। इसमें अच्छा या बुरा मैं क्या कह रहा हूँ, कुछ नहीं जानता? कौन ऐसा धीर व्यक्ति है, जो आपकी मायाके नृत्यमें स्थिर रह सके। अतएव मेरे मुखसे आप ही वक्ता हैं और आप ही श्रोता हैं। यह अत्यन्त रहस्यकी बात है। अब मैं उस अत्यन्त गूढ़ साधनकी बात बतला रहा हूँ। श्रीराधाकृष्णकी यह कुञ्जलीला—रासलीला अत्यन्त गम्भीर है। दास्य, सख्य, वात्सल्य आदि भाववाले भक्तोंको भी यह लीला दृष्टिगोचर नहीं होती। इसमें उनका भी प्रवेशाधिकार नहीं है। एकमात्र सखियोंका ही इसमें अधिकार है। सखीसे इस लीलाका विस्तार होता है। सखीके बिना यह लीला पुष्ट नहीं होती। सखियाँ इस लीलाको विस्तार करती हैं और वे ही इसका आस्वादन करती हैं। इसलिए सखीकी सहायताके बिना, उनका आश्रय लिये बिना इस लीलामें प्रवेश करनेका और कोई भी उपाय नहीं है। जो सखियोंके भावोंका अनुसरण करते हैं, उनके आनुगत्य और आश्रयमें रहकर भजन करते हैं, केवल वे ही श्रीराधाकृष्णकी कुञ्जसेवाको प्राप्त हो सकते हैं। इस साध्यको पानेके लिए सखीके पदाश्रय और उनके स्मरणके बिना कोई दूसरा उपाय नहीं है।” श्रीजयदेव कविका जीवन चरित्र कविवर श्रीजयदेव गोस्वामीने पश्चिम बंगालके वीरभूमि जिलेमें प्रायः दस कोस दक्षिणमें अजय नदीके उत्तर भागमें स्थित केन्दुबिल्व नामक ग्राममें जन्म ग्रहण किया था। यह केन्दुबिल्व ग्राम साधारणतः केन्दुलीके नामसे ही विशेषरूपसे प्रचलित है। श्रीजयदेवके पिताजीका नाम भोजदेव और उनकी गर्भधारिणी माताका नाम वामादेवी था। श्रीजयदेव गोस्वामीने स्वयं ही कहा है—
[ढ] श्रीगीतगोविन्दम् वर्णितं जयदेवकेन हरेरिदं प्रवणेन। केन्दुबिल्व-समुद्र सम्भव-रोहिणी-रमणेन ॥ जिस प्रकार महाराज विक्रमादित्य एक परम विद्योत्साही और गुणग्राही थे, बंगाधिपति महाराज लक्ष्मणसेन भी उसी प्रकारसे विद्वान और गुणियोंका समादर करते थे। महाराज विक्रमादित्यकी सभा जैसे कालिदास, वररुचि आदि नवरत्नोंकी शोभासे अलंकृत होती थी, महाराज लक्ष्मणसेनकी सभामें उसी प्रकार गोवर्द्धनाचार्य, जयदेव इत्यादि पञ्चरत्न विराजमान थे।^(१) उक्त महाराजकी सभाके द्वारदेशमें प्रस्तर फलकमें जो श्लोक लिखा गया है, उसका पाठकर यह ज्ञात होता है कि महाराज लक्ष्मणसेनकी सभामें गोवर्द्धन, शरण, जयदेव, उमापति और कविराज नामक राज-पण्डित थे। वह इस प्रकार है— वाचः पल्लवयत्युमापतिधरः सन्दर्भशुद्धिं गिरां। जानीते जयदेव एव शरणं श्लाघ्यो दुरुह-द्रुते ॥ शृङ्गारोत्तर सत्प्रमेय-वचनैराचार्य-गोवर्द्धन। स्पर्धी कोऽपि न विश्रुतः श्रुतिधरो धोयी कवि-क्ष्मापतिः ॥ अतः श्रीगीतगोविन्दके प्रारम्भमें कवि जयदेव गोस्वामीके द्वारा लिखित इस श्लोकमें इन सभी राजपण्डितोंके नाम उल्लिखित हैं। इनमें उमापतिधर महाराजके प्रधानमंत्री थे। वे सभी पण्डितोंका समादर करते थे। श्रीजयदेव गोस्वामीने कब जन्म ग्रहण किया, यह निर्णय करना परम दुसाध्य है। श्रीचैतन्यमहाप्रभुके प्रधान शिष्य श्रीसनातन गोस्वामी द्वारा लिखित प्रमाणके अनुसार श्रीजयदेव गोस्वामीको बंगाधिपति महाराज लक्ष्मीसिंहका समकालीन व्यक्ति कहा जा सकता है। प्रामाणिक ग्रन्थोंके आधार पर (१) गोवर्द्धनश्च शरणो जयदेव उमापतिः। कविराजश्च रत्नानि समितौ लक्ष्मणस्य च॥
प्रस्तावना [ण] यह कहा जाता है कि १०३० शकाब्द और ११०७ खृष्टाब्द श्रीलक्ष्मणसेनके राजत्वका समय है। इसके सम्बन्धमें डा. राजेन्द्रलाल मित्रने गभीर गवेषणा द्वारा पुष्ट प्रमाणोंके आधार पर ऐसा लिखा है। अतएव उपरोक्त प्रमाणोंके द्वारा यह प्रतिपन्न हो रहा है कि श्रीलक्ष्मणसेन द्वादश शताब्दीके व्यक्ति थे और उन्हींके समसामयिक श्रीजयदेव कवि भी द्वादश शताब्दीके होंगे, इसमें सन्देहकी कोई बात नहीं है। महाराज पृथ्वीराजके सभासद चाँदकविने अपने चौहान-राष्ट्र नामक ग्रन्थमें प्राचीन कवियोंका गुणगान किया है। श्रीजयदेव कवि एवं गीतगोविन्दका भी उसमें उल्लेख है। खृष्टीय द्वादश शताब्दीके शेषभागमें पृथ्वीराज दिल्ली नगरमें राज्य कर रहे थे। ११९३ खृष्टाब्दमें दृशद्वति नदीके तीर पर मुहम्मद गौरीके साथ युद्धमें वे मारे गये। इसके द्वारा स्पष्ट प्रमाणित हो रहा है कि चाँदकविके पूर्व ही गीतगोविन्दकी रचना हो चुकी थी। ऐसा नहीं होनेसे चाँदकवि अपने ग्रन्थमें गीतगोविन्दका नामोल्लेख नहीं कर सकते थे। श्रीजयदेव गोस्वामीकी जीवनीके सम्बन्धमें नाभाजी भट्ट प्रणीत भक्तमाल ग्रन्थमें अनेक अद्भुत और अलौकिक घटनाओंका वर्णन है। ग्रन्थके बाहुल्यसे उन सब विषयोंका अधिक वर्णन करना अनावश्यक समझता हूँ। श्रीजयदेव गोस्वामीको मानव-लीला सम्वरण किये हुए अनेक शताब्दियाँ बीत चुकी हैं; किन्तु आज भी उनके तिरोभावके स्मरणमें कान्दुली-ग्राममें प्रतिवर्ष माघ महीनेमें मकर-संक्रान्तिसे आरम्भ होकर एक विराट् मेला लगता है। उस मेलेमें पचास-साठ हजारसे एक लाख तक लोग सम्मिलित होकर श्रीजयदेव गोस्वामीकी समाधि मन्दिरमें उपासना करते हैं और उस समय सभी वैष्णव लोग मिलकर श्रीराधाकृष्णके मिलन विषयक श्रीजयदेव गोस्वामीके काव्यका पठन-पाठन करते हैं।
[त] श्रीगीतगोविन्दम् श्रीगीतगोविन्दकी टीकाएँ श्रीगीतगोविन्दकी निम्नलिखित छह प्रसिद्ध टीकाएँ प्राप्त होती हैं— १. रसमञ्जरी—इसके प्रणेता महामहोपाध्याय शंकरमिश्र हैं। उन्होंने इस टीकाका प्रणयन श्रीशालीनाथकी प्रेरणासे किया था। २. रसिकप्रिया—इस व्याख्याके प्रणेता कुम्भनृपति कुम्भकरण थे। ये मेवाड़के राजा थे। इनके राज्यकालका समय ईसाकी चौदहवीं शताब्दीका प्रथम चरण माना जाता है। ३. सञ्जीवनी—इसके प्रणेता वनमाली भट्ट हैं। ४. पदद्योतनिका—इसके प्रणेता नारायण भट्ट हैं। ५. बालबोधिनी—इसके प्रणेता श्रीपुजारी गोस्वामी हैं। ६. दीपिका—इसके प्रणेता आचार्य गोपाल हैं। इस ग्रन्थकी मूल प्रतिलिपिका संकलन श्रीमान् भक्तिवेदान्त तीर्थ महाराजने बड़े परिश्रमसे किया है। उन्होंने इस अभिनव संस्करणका ढाँचा प्रस्तुत किया। तत्पश्चात् बेटी श्रीमती मधु खण्डेलवाल एम. ए., पीएच. डी. ने इसकी भाषाका संशोधन और अलंकृत कर मानो इसमें प्राणशक्तिका संचार किया है। यही नहीं अपितु सौभाग्यवती बेटीने बड़े परिश्रमसे इस गीतगोविन्द-ग्रन्थके दुर्लभ किन्तु अतिशय सुन्दर और भावपूर्ण श्रीविनयमोहन सक्सेना, दिल्ली निवासी द्वारा रचित पद्यानुवाद खोजकर इसमें सन्निहित किया है। इसका यह कार्य अत्यन्त सराहनीय है। श्रीभक्तिवेदान्त माधव महाराजजीने तथा श्रीओमप्रकाश ब्रजवासी एम. ए., एल. एल. बी., साहित्यरत्नने इसका विशेषरूपसे प्रूफ-संशोधन किया है। श्रीमान् सुबलसखा ब्रह्मचारी और श्रीपुरन्दर ब्रह्मचारीने कम्प्यूटरसे इसकी प्रतिलिपि प्रस्तुत की है। विशेषतः श्रीमान् पुण्डरीक ब्रह्मचारी तथा
प्रस्तावना [थ] सौभाग्यवती वृन्दादेवीने मेरे साथ रहकर बड़े परिश्रमसे इस ग्रन्थका प्रूफ-संशोधन किया है। मैं श्रीजयदेव गोस्वामी तथा उनकी परमाराध्या श्रीराधिका एवं ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीश्यामसुन्दरके चरणोंमें प्रार्थना करता हूँ कि वे उनपर अहैतुकी कृपा करें, जिससे वे इस प्रसिद्ध काव्यके यथार्थतः अधिकारी बन सकें। शीघ्रतासे इसका प्रकाशन होनेके कारण कुछेक त्रुटियाँ रह गई हैं। कृपालु सहृदय पाठकगण इन त्रुटियोंका संशोधन कर इसके भावार्थको ग्रहण करेंगे और पत्रके माध्यमसे मुझे सूचित करेंगे, जिसका मैं अगले संस्करणमें संशोधन कर सकूँ। फाल्गुन पूर्णिमा श्रीहरि-गुरु-वैष्णव कृपालेश प्रार्थी ५१७ श्रीगौराब्द दीनहीन भारतीयाब्द १९२४, त्रिदण्डिभिक्षु श्रीभक्तिवेदान्त नारायण १८ मार्च २००३ ई.
[अ] विषय—सूची सर्ग पृष्ठ प्रथम — सामोद-दामोदरः १ द्वितीय — अक्लेश केशवः ९१ तृतीय — मुग्ध मधुसूदनः १२५ चतुर्थ — स्निग्ध-मधुसूदनः १५१ पञ्चम — सकांक्ष-पुण्डरीकाक्षः १८१ षष्ठ — धृष्ट-वैकुण्ठः २०९ सप्तम — नागर-नारायणः २२३ अष्टम — विलक्ष-लक्ष्मीपतिः २७२ नवम — मुग्ध-मुकुन्दः २९० दशम — मुग्ध-माधवः ३०४ एकादश— स्वानन्द-गोविन्दः ३३० द्वादश — सुप्रीत-पीताम्बरः ३७५
[आ] चित्र-सूची चित्र सर्ग पृष्ठ १. हरि-राधा मदमाते प्रथम २ २. हरि-मूरतका ध्यान द्वितीय ९४ ३. मैं अपराधी रोक न पाया तृतीय १२८ ४. और सखीकी व्यथा-कथा चतुर्थ १५० ५. तव विरहे वनमाली पंचम १८२ ६. हे हरि, राधा आवास गृहे षष्ठ २१० ७. विफल रूप यौवन नव मेरा सप्तम २२६ ८. मनिनी ! मत अब मान करो नवम २९२ ९. प्रिये चारुशीले ! तजो मान प्यारा दशम ३०६ १०. चल सखि ! चल घनश्याम सदनमें एकादश ३३२ ११. मानिनि ! अपना मान बिसारो द्वादश ३७८ १२. अनुहारमयी राधा द्वादश ३८६ चित्रकारोंकी सूची १. श्रीश्याम रानी दासी (प्रमुख चित्रकार) २. श्रीकृष्णकारुण्य दास (सहायक) ३. श्रीसत्प्रेम दास ( ,, ) ४. श्रीगोपी दासी ( ,, ) ५. श्रीनीलाम्बरी दासी ( ,, ) ६. श्रीसुन्दरी दासी ( ,, ) ७. श्रीकृष्णवल्लभ दासी ( ,, ) ८. श्रीप्रेमानन्दी दासी ( ,, ) ९. श्रीप्रेमवती दासी ( ,, ) १०. श्रीअनिता दासी ( ,, )
[इ] श्लोक-सूची अ पृष्ठ संख्या आ पृष्ठ संख्या अङ्गेष्वाभरणं करोति २१९ आपादलम्बिनीमाला ३९ अङ्गे स्वेदः ११६ आवासो विपिनायते १६१ अक्ष्णोर्निक्षिपदञ्जनं ३४५ आश्लेषचुम्बन २०४ अमल कमल दल लोचन ४४ आश्लेषादनु चुम्बनादनु २०१ अभिनव जलधर ४६ इ अभिव्यक्तान्य तरुणी ८४ इतस्ततस्तामनुसृत्य १२७ अतिक्रम्यापाङ्ग श्रवणपथ ३६८ इति चटुल-चाटु-पटु ३१६ अत्रान्तरे च कुलटा २२३ इत्थं केलिततीर्विहृत्य ४१२ अत्रान्तरे मसृण-रोष ३०४ इहं रस-भणने कृत २५४ अथ सा निर्गत बाधा ३९६ ई अथ कथमपि यामिनीं २७२ ईषद् विकसितै गण्डैः ७७ अथ तां गन्तुमशक्तां २०९ ईषन्मीलितदृष्टि मुग्ध ३९५ अथागतां माधवमन्तरेण २३५ उ अधिगतमखिल-सखी ३३९ उन्मद मदन मनोरथ ६० अधर-सुधारसमुपनय ३८२ उन्मीलनमधुगन्ध ७१ अद्योत् सङ्ग वसद् भुजङ्ग ६९ उरसि मुरारेरुपहित १९४ अन्तर्मोहन-मौलि-घूर्णन २८७ उल्काभवति सा यस्या ५३,१०५ अनिल-तरल-किसलय ३३६ क अनिल-तरल-कुवलय २५८ कंसारिरपि संसार १२५ अनेक नारी परिरम्भ ७३ कति न कथितमिदम् २९४ अनुरागोऽनुरक्तायां १०८ कथित समयेऽपि २२५ अमृत-मधुर-मृदुतर २६० कन्दर्प ज्वर १७५ अलसनिमीलित ११२ कनक निकष रुचि २६२ अलिकुल गञ्जन ३९९ कर कमलेन करोमि ३७९ अविरल-निपतित १५४ करतल ताल तरल ८२ अहह कलयामि २३० कालिय विषधर ४१ अहमिह निवसामि २३२ कापिविलास विलोल ७९ अहमिह निवसामि १८१ कापि कपोल तले ८० कज्ज्वल मलिन विलोचन २७७
[ई] पृष्ठ संख्या पृष्ठ संख्या काश्मीर गौर वपु ३४६ चन्द्रक चारु मयूर ९६ किं करिष्यति १३० चरण कमल गलदलक्तक २७९ किं विश्राम्यसि कृष्ण २२१ चरण किसलये कमया २५२ किमिति विषीदसि २९५ चरण रणित मणि ११४ किशलय शयन तले ३७६ चिन्तयामि तदाननं १३१ किशलय शयन निवेशितया १११ चेष्टा भवति पून्नार्यो १०९ कुरु यदुनन्दन! चन्दन ३९७ छ कुसुम विशिख शर १५५ छलयसि विक्र्मणे १७,२५ कुसुम सुकुमार २३१ ज कुसुमचय रचित शुचि ३५० जनकसुताकृतभूषण ४५ कृष्णोऽपि तं दन्तवक्रं ५५ जनयसि मनसि २९७ केलिकला कुतुकेन ८१ जयश्रीविन्यस्तैर्महित ३७१ कोकिल कलरव ११३ जलदपटलबलबिन्दु ९९ क्लेशकर्म विपाका ९२ जित विस शकले मृदु २४९ क्षितिरति विपुलतरे १७,२१ त क्षत्रिय रुधिरमये १७,२६ तत्किं कामपि २३३ क्षणमपि विरहः १७७ तन्विखिन्नमसूचया १३३ क्षम्यतापरं १३५ तरल-दृगञ्चल-चलन ३६२ ग तवकरकमलवरे १७,२४ गणयति गुणग्रामं भ्रामं १०४ तवचरणेप्रणता ४७ गतवति सखीवृन्दे ३७५ तवेदं पश्यन्त्याः २८५ गोपकदम्ब नितम्बवती ९७ तस्याः पाटलपाणिजाङ्कित ३९१ घ तानिस्पर्शसुखानि १४५ घटयति सुघने कुच युग २४८ तामथ मन्मथ खिन्नां २९० घनचय रुचिरे रचयति २४६ तामहं हृदि सङ्ग १३२ घन जघन स्तन ३३४ तालफलादपि २९४ च तिर्यक् कण्ठ विलोल १४७ चञ्चल कुण्डल २४० त्वमसि मम भूषणं ३०९ चन्दन चर्चित नील ७४,७५ त्वां चित्तेन चिरं ३५५ त्यजति न पाणि तलेन १६७