गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना [छ] यदि एकान्तिक अभिलाषा हो तभी सुमधुर कोमलकान्त पदावलीयुक्त जयदेवके अप्राकृत काव्यका श्रवण करो। श्रीजयदेव गोस्वामीने इस अप्राकृत काव्यमें श्रीराधामाधवके अप्राकृत प्रणयका मनोज्ञ (सुन्दर) वर्णन किया है। शृंगाररसके विप्रलम्भ तथा संभोग दोनों पक्षोंका चरमोत्कर्ष इसी गीतिकाव्यमें दृष्टिगोचर होता है। कविकी मान्यता यह है कि विप्रलम्भ द्वारा परिपुष्ट संभोग शृंगार-रसिक, सिद्ध-महापुरुषों एवं भक्तिसाधकोंको अधिक सुखप्रद प्रतीत होता है। अधिकारीके निर्णयके सम्बन्धमें श्रीमद्भगवद्गीताके अट्ठारहवें अध्यायके ६७-६८ श्लोकोंमें स्वयं-भगवान् श्रीकृष्णने अपने अन्तरङ्ग भक्त अर्जुनको गीताके श्रवण एवं कीर्तनका अधिकारी और अनधिकारीका उपदेश दिया है। इदन्ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन। न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥ जो लोग श्रद्धालु नहीं हैं, मेरे प्रति शुद्धभक्ति नहीं है, जो अनधिकारी हैं, ऐसे लोगोंको यह मेरा अत्यन्त रहस्यपूर्ण ज्ञान और विज्ञान उन्हें श्रवण मत कराओ। य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति। भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥ अर्थात् जो लोग मेरे इस परमगुह्यतम गीताके अत्यन्त रहस्यपूर्ण ज्ञान विज्ञानका अत्यन्त श्रद्धालु भक्तोंको श्रवण कराते हैं, इस प्रकार अन्तमें वे मुझे ही प्राप्त होते हैं। इसलिए पहले श्लोकमें अनधिकारी और दूसरे श्लोकमें अधिकारीकी बात की है। श्रीजीवगोस्वामीने भी श्रीगोपालचम्पू सुननेके लिए अनधिकारी और अधिकारीका स्पष्टरूपसे विवेचन करते हुए अनधिकारी, भक्तिरहित, श्रद्धारहित, व्यक्तियोंको उक्त ग्रन्थ पढ़नेके लिए निषेध किया है। श्रीसनातन गोस्वामीने भी बृहद्भागवतामृत नामक ग्रन्थका