गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[च] श्रीगीतगोविन्दम् श्रीगीतगोविन्द आजकल शिक्षित समाजमें शृंगाररसात्मक सुमधुर काव्यके रूपमें ही प्रसिद्ध है और उसके प्रणेता पूज्यपाद श्रीजयदेव गोस्वामी एक असाधारण कविके रूपमें हैं। परन्तु श्रीगीतगोविन्द काव्य होनेपर भी केवल छन्दोबद्ध रसात्मक वाक्यस्वरूप लोकप्रसिद्ध आलंकारिक काव्य नहीं है। जयदेव गोस्वामी स्वयं कवि होनेपर भी सुमधुर पदविन्यास करनेमें कुशल रचनाकार और स्वभाव विकासक केवल कविमात्र नहीं हैं। श्रीगीतगोविन्द सर्ववेदका सार एवं श्रीजयदेव गोस्वामी सर्ववेद विशारद परम साधक और सिद्ध भी हैं। पाठकगण श्रीगीतगोविन्दका पाठ करनेसे पूर्व या आरम्भमें यह देखेंगे कि ग्रन्थकारने अपने इष्टदेवताके स्मरणरूप मङ्गलाचरणमें यही लिखा है— “राधा-माधवयो र्जयन्ति यमुनाकूले रहः केलयः।” अर्थात् श्रीयमुनापुलिनमें श्रीराधामाधवकी गम्भीर एवं सुगूढ़ विहारलीला सर्वोपरि विराजमान हो रही है। द्वितीय श्लोकमें उनके वर्णनीय विषयका परिचय दिया है— “श्रीवासुदेव-रतिकेलि-कथा-समेतमेतं करोति जयदेव-कविः प्रबन्धम्॥” अर्थात् जयदेव कवि श्रीवासुदेव व्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दरकी परम आनन्दमय रतिविहारका अवलम्बन करके यह प्रबन्ध लिख रहे हैं। जैसा कि हमने पहले कहा है, तृतीय श्लोकमें उन्होंने इस ग्रन्थका अधिकारी भी निर्णय किया है— यदि हरिस्मरणे सरसं मनो यदि विलासकलासु कुतूहलम्। मधुर-कोमल-कान्त-पदावलीं शृणु तदा जयदेव सरस्वतीम्॥ अर्थात् यदि हरि स्मरण करनेमें मनको अनुरक्त करना चाहते हो अथवा तुम्हारा मन हरिस्मरणमें अनुरक्त है और यदि उस लीलारसको आस्वादन करनेका कौतूहल हो अर्थात्