गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ढ] श्रीगीतगोविन्दम् वर्णितं जयदेवकेन हरेरिदं प्रवणेन। केन्दुबिल्व-समुद्र सम्भव-रोहिणी-रमणेन ॥ जिस प्रकार महाराज विक्रमादित्य एक परम विद्योत्साही और गुणग्राही थे, बंगाधिपति महाराज लक्ष्मणसेन भी उसी प्रकारसे विद्वान और गुणियोंका समादर करते थे। महाराज विक्रमादित्यकी सभा जैसे कालिदास, वररुचि आदि नवरत्नोंकी शोभासे अलंकृत होती थी, महाराज लक्ष्मणसेनकी सभामें उसी प्रकार गोवर्द्धनाचार्य, जयदेव इत्यादि पञ्चरत्न विराजमान थे।^(१) उक्त महाराजकी सभाके द्वारदेशमें प्रस्तर फलकमें जो श्लोक लिखा गया है, उसका पाठकर यह ज्ञात होता है कि महाराज लक्ष्मणसेनकी सभामें गोवर्द्धन, शरण, जयदेव, उमापति और कविराज नामक राज-पण्डित थे। वह इस प्रकार है— वाचः पल्लवयत्युमापतिधरः सन्दर्भशुद्धिं गिरां। जानीते जयदेव एव शरणं श्लाघ्यो दुरुह-द्रुते ॥ शृङ्गारोत्तर सत्प्रमेय-वचनैराचार्य-गोवर्द्धन। स्पर्धी कोऽपि न विश्रुतः श्रुतिधरो धोयी कवि-क्ष्मापतिः ॥ अतः श्रीगीतगोविन्दके प्रारम्भमें कवि जयदेव गोस्वामीके द्वारा लिखित इस श्लोकमें इन सभी राजपण्डितोंके नाम उल्लिखित हैं। इनमें उमापतिधर महाराजके प्रधानमंत्री थे। वे सभी पण्डितोंका समादर करते थे। श्रीजयदेव गोस्वामीने कब जन्म ग्रहण किया, यह निर्णय करना परम दुसाध्य है। श्रीचैतन्यमहाप्रभुके प्रधान शिष्य श्रीसनातन गोस्वामी द्वारा लिखित प्रमाणके अनुसार श्रीजयदेव गोस्वामीको बंगाधिपति महाराज लक्ष्मीसिंहका समकालीन व्यक्ति कहा जा सकता है। प्रामाणिक ग्रन्थोंके आधार पर (१) गोवर्द्धनश्च शरणो जयदेव उमापतिः। कविराजश्च रत्नानि समितौ लक्ष्मणस्य च॥