गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
पृष्ठ 19, कुल 448 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना [ड] प्रेरणा करते हैं, वही मैं कहता हूँ। इसमें अच्छा या बुरा मैं क्या कह रहा हूँ, कुछ नहीं जानता? कौन ऐसा धीर व्यक्ति है, जो आपकी मायाके नृत्यमें स्थिर रह सके। अतएव मेरे मुखसे आप ही वक्ता हैं और आप ही श्रोता हैं। यह अत्यन्त रहस्यकी बात है। अब मैं उस अत्यन्त गूढ़ साधनकी बात बतला रहा हूँ। श्रीराधाकृष्णकी यह कुञ्जलीला—रासलीला अत्यन्त गम्भीर है। दास्य, सख्य, वात्सल्य आदि भाववाले भक्तोंको भी यह लीला दृष्टिगोचर नहीं होती। इसमें उनका भी प्रवेशाधिकार नहीं है। एकमात्र सखियोंका ही इसमें अधिकार है। सखीसे इस लीलाका विस्तार होता है। सखीके बिना यह लीला पुष्ट नहीं होती। सखियाँ इस लीलाको विस्तार करती हैं और वे ही इसका आस्वादन करती हैं। इसलिए सखीकी सहायताके बिना, उनका आश्रय लिये बिना इस लीलामें प्रवेश करनेका और कोई भी उपाय नहीं है। जो सखियोंके भावोंका अनुसरण करते हैं, उनके आनुगत्य और आश्रयमें रहकर भजन करते हैं, केवल वे ही श्रीराधाकृष्णकी कुञ्जसेवाको प्राप्त हो सकते हैं। इस साध्यको पानेके लिए सखीके पदाश्रय और उनके स्मरणके बिना कोई दूसरा उपाय नहीं है।” श्रीजयदेव कविका जीवन चरित्र कविवर श्रीजयदेव गोस्वामीने पश्चिम बंगालके वीरभूमि जिलेमें प्रायः दस कोस दक्षिणमें अजय नदीके उत्तर भागमें स्थित केन्दुबिल्व नामक ग्राममें जन्म ग्रहण किया था। यह केन्दुबिल्व ग्राम साधारणतः केन्दुलीके नामसे ही विशेषरूपसे प्रचलित है। श्रीजयदेवके पिताजीका नाम भोजदेव और उनकी गर्भधारिणी माताका नाम वामादेवी था। श्रीजयदेव गोस्वामीने स्वयं ही कहा है—