गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ठ] श्रीगीतगोविन्दम् श्रीरामानन्दके मुखसे श्रीमन्शचीनन्दन गौरहरिके प्रश्नोंके उत्तरमें कहा है— प्रभु कहे,—‘साध्यवस्तुर अवधि’ एइ हय। तोमार प्रसादे इहा जानिलूँ निश्चय॥ ‘साध्यवस्तु’ ‘साधन’ बिना केह नाहि पाय। कृपा करि कह, राय, पावार उपाय॥ राय कहे,—जेइ कहाओ, सेइ कहि वाणी। कि कहिये भाल-मन्द, किछुइ ना जानि॥ त्रिभुवन-मध्ये ऐछे हय कोन धीर। जे तोमार माया-नाटे हइबेक स्थिर॥ मोर मुखे वक्ता तुमि, तुमि हओ श्रोता। अत्यन्त रहस्य, शुन, साधनेर कथा॥ राधाकृष्णेर लीला एइ अति गूढ़तर। दास्य-वात्सल्य-भावे ना हय गोचर॥ सबे एक सखीगणेर इहा अधिकार। सखी हइते हय एइ लीलार विस्तार॥ सखी बिना एइ लीला पुष्ट नाहि हय। सखी लीला विस्तारिया, सखी आस्वादय॥ सखी बिना एइ लीलाय अन्येर नाहि गति। सखीभावे जे ताँरे करे अनुगति। राधाकृष्ण-कुञ्जसेवा-साध्य सेइ पाय। सेइ साध्य पाइते आर नाहिक उपाय॥ तात्पर्य यह है कि श्रीराय रामानन्दके मुखसे साध्य वस्तुके सम्बन्धमें सुनकर श्रीचैतन्य महाप्रभुने कहा—"यहीं तक साध्य वस्तुकी सीमा और अवधि है। तुम्हारी कृपासे मैं यह सब अच्छी तरहसे जान गया। किन्तु यह अत्यन्त गम्भीर साध्य-वस्तु बिना साधनके कोई नहीं पा सकता। हे राय! आप कृपा करके इसको प्राप्त करनेका उपाय बतलाइये।” रायजीने कहा—"आप जो कुछ हमारे हृदयमें