गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना [ट] अवलम्बन करना होता है और श्रीकृष्णको पानेके लिए सखीभावापन्न सद्गुरुका आश्रय ग्रहण करना होता है। यही अखिल श्रुतियोंका सार है। श्रुतियोंने कहा है- तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम्। शाब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाश्रयम् ॥ (श्रीमद्भागवत ११/३/२१) अर्थात् ब्रह्मको जाननेके लिए ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरुका आश्रय करना होता है। नैमिषारण्य नामक पुण्यारण्यमें श्रीसूत गोस्वामीने श्रीमद्भागवतका पाठ करते समय श्रीमद्भागवतको ही अखिल श्रुतिसार बताया है। श्रीमद्भागवतका सार रासलीला है। सारदर्शी कविवर श्रीजयदेव गोस्वामीने कृपापरवश होकर उसी सारादपि सार श्रीमद्भागवतोक्त श्रीरासलीलाको निचोड़कर गागरमें सागर भरकर कलिजीवोंकी स्वतः प्रवृत्तिके लिए श्रीगीतगोविन्द नामक काव्यामृतको प्रकाश किया है। श्रीशुकदेव गोस्वामीने परीक्षित महाराजके प्रश्नके उत्तरमें कहा था- अनुग्रहाय भक्तानां मानुषं देहमाश्रितः। भजते तादृशीः क्रीड़ा याः श्रुत्वा तत्परो भवेत् ॥ अर्थात् भगवान् श्रीकृष्ण अपने भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिए इस प्रकारकी लीलाएँ प्रकाश करते हैं। शृंगाररस-प्रिय अभक्त भी इसे सुनकर क्रमशः श्रीकृष्ण-परायण होंगे। इसके द्वारा यह समझा जा सकता है कि भगवान् श्रीकृष्णने भक्त-अभक्त सभीके प्रति कृपावश होकर इस प्रकार शृंगारप्रिय लीलाको धरणीतल पर प्रकट की है। महर्षि वेदव्यासने सबके प्रति कृपा-परवश होकर उसको लिपिबद्ध किया और परमभक्त श्रीशुकदेव गोस्वामीने भी कृपा-परवश होकर ही पृथ्वीपर इसका प्रचार किया है। उसके पश्चात् कविवर जयदेव गोस्वामीने भी कृपा-परवश होकर और भी मधुरतर काव्यके आकारमें उसे प्रकाशित किया है। श्रीचैतन्यचरितामृतमें श्रीरायरामानन्द संवादमें