गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना [ण] यह कहा जाता है कि १०३० शकाब्द और ११०७ खृष्टाब्द श्रीलक्ष्मणसेनके राजत्वका समय है। इसके सम्बन्धमें डा. राजेन्द्रलाल मित्रने गभीर गवेषणा द्वारा पुष्ट प्रमाणोंके आधार पर ऐसा लिखा है। अतएव उपरोक्त प्रमाणोंके द्वारा यह प्रतिपन्न हो रहा है कि श्रीलक्ष्मणसेन द्वादश शताब्दीके व्यक्ति थे और उन्हींके समसामयिक श्रीजयदेव कवि भी द्वादश शताब्दीके होंगे, इसमें सन्देहकी कोई बात नहीं है। महाराज पृथ्वीराजके सभासद चाँदकविने अपने चौहान-राष्ट्र नामक ग्रन्थमें प्राचीन कवियोंका गुणगान किया है। श्रीजयदेव कवि एवं गीतगोविन्दका भी उसमें उल्लेख है। खृष्टीय द्वादश शताब्दीके शेषभागमें पृथ्वीराज दिल्ली नगरमें राज्य कर रहे थे। ११९३ खृष्टाब्दमें दृशद्वति नदीके तीर पर मुहम्मद गौरीके साथ युद्धमें वे मारे गये। इसके द्वारा स्पष्ट प्रमाणित हो रहा है कि चाँदकविके पूर्व ही गीतगोविन्दकी रचना हो चुकी थी। ऐसा नहीं होनेसे चाँदकवि अपने ग्रन्थमें गीतगोविन्दका नामोल्लेख नहीं कर सकते थे। श्रीजयदेव गोस्वामीकी जीवनीके सम्बन्धमें नाभाजी भट्ट प्रणीत भक्तमाल ग्रन्थमें अनेक अद्भुत और अलौकिक घटनाओंका वर्णन है। ग्रन्थके बाहुल्यसे उन सब विषयोंका अधिक वर्णन करना अनावश्यक समझता हूँ। श्रीजयदेव गोस्वामीको मानव-लीला सम्वरण किये हुए अनेक शताब्दियाँ बीत चुकी हैं; किन्तु आज भी उनके तिरोभावके स्मरणमें कान्दुली-ग्राममें प्रतिवर्ष माघ महीनेमें मकर-संक्रान्तिसे आरम्भ होकर एक विराट् मेला लगता है। उस मेलेमें पचास-साठ हजारसे एक लाख तक लोग सम्मिलित होकर श्रीजयदेव गोस्वामीकी समाधि मन्दिरमें उपासना करते हैं और उस समय सभी वैष्णव लोग मिलकर श्रीराधाकृष्णके मिलन विषयक श्रीजयदेव गोस्वामीके काव्यका पठन-पाठन करते हैं।