गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[त] श्रीगीतगोविन्दम् श्रीगीतगोविन्दकी टीकाएँ श्रीगीतगोविन्दकी निम्नलिखित छह प्रसिद्ध टीकाएँ प्राप्त होती हैं— १. रसमञ्जरी—इसके प्रणेता महामहोपाध्याय शंकरमिश्र हैं। उन्होंने इस टीकाका प्रणयन श्रीशालीनाथकी प्रेरणासे किया था। २. रसिकप्रिया—इस व्याख्याके प्रणेता कुम्भनृपति कुम्भकरण थे। ये मेवाड़के राजा थे। इनके राज्यकालका समय ईसाकी चौदहवीं शताब्दीका प्रथम चरण माना जाता है। ३. सञ्जीवनी—इसके प्रणेता वनमाली भट्ट हैं। ४. पदद्योतनिका—इसके प्रणेता नारायण भट्ट हैं। ५. बालबोधिनी—इसके प्रणेता श्रीपुजारी गोस्वामी हैं। ६. दीपिका—इसके प्रणेता आचार्य गोपाल हैं। इस ग्रन्थकी मूल प्रतिलिपिका संकलन श्रीमान् भक्तिवेदान्त तीर्थ महाराजने बड़े परिश्रमसे किया है। उन्होंने इस अभिनव संस्करणका ढाँचा प्रस्तुत किया। तत्पश्चात् बेटी श्रीमती मधु खण्डेलवाल एम. ए., पीएच. डी. ने इसकी भाषाका संशोधन और अलंकृत कर मानो इसमें प्राणशक्तिका संचार किया है। यही नहीं अपितु सौभाग्यवती बेटीने बड़े परिश्रमसे इस गीतगोविन्द-ग्रन्थके दुर्लभ किन्तु अतिशय सुन्दर और भावपूर्ण श्रीविनयमोहन सक्सेना, दिल्ली निवासी द्वारा रचित पद्यानुवाद खोजकर इसमें सन्निहित किया है। इसका यह कार्य अत्यन्त सराहनीय है। श्रीभक्तिवेदान्त माधव महाराजजीने तथा श्रीओमप्रकाश ब्रजवासी एम. ए., एल. एल. बी., साहित्यरत्नने इसका विशेषरूपसे प्रूफ-संशोधन किया है। श्रीमान् सुबलसखा ब्रह्मचारी और श्रीपुरन्दर ब्रह्मचारीने कम्प्यूटरसे इसकी प्रतिलिपि प्रस्तुत की है। विशेषतः श्रीमान् पुण्डरीक ब्रह्मचारी तथा