गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
प्रस्तावना [ण] यह कहा जाता है कि १०३० शकाब्द और ११०७ खृष्टाब्द श्रीलक्ष्मणसेनके राजत्वका समय है। इसके सम्बन्धमें डा. राजेन्द्रलाल मित्रने गभीर गवेषणा द्वारा पुष्ट प्रमाणोंके आधार पर ऐसा लिखा है। अतएव उपरोक्त प्रमाणोंके द्वारा यह प्रतिपन्न हो रहा है कि श्रीलक्ष्मणसेन द्वादश शताब्दीके व्यक्ति थे और उन्हींके समसामयिक श्रीजयदेव कवि भी द्वादश शताब्दीके होंगे, इसमें सन्देहकी कोई बात नहीं है। महाराज पृथ्वीराजके सभासद चाँदकविने अपने चौहान-राष्ट्र नामक ग्रन्थमें प्राचीन कवियोंका गुणगान किया है। श्रीजयदेव कवि एवं गीतगोविन्दका भी उसमें उल्लेख है। खृष्टीय द्वादश शताब्दीके शेषभागमें पृथ्वीराज दिल्ली नगरमें राज्य कर रहे थे। ११९३ खृष्टाब्दमें दृशद्वति नदीके तीर पर मुहम्मद गौरीके साथ युद्धमें वे मारे गये। इसके द्वारा स्पष्ट प्रमाणित हो रहा है कि चाँदकविके पूर्व ही गीतगोविन्दकी रचना हो चुकी थी। ऐसा नहीं होनेसे चाँदकवि अपने ग्रन्थमें गीतगोविन्दका नामोल्लेख नहीं कर सकते थे। श्रीजयदेव गोस्वामीकी जीवनीके सम्बन्धमें नाभाजी भट्ट प्रणीत भक्तमाल ग्रन्थमें अनेक अद्भुत और अलौकिक घटनाओंका वर्णन है। ग्रन्थके बाहुल्यसे उन सब विषयोंका अधिक वर्णन करना अनावश्यक समझता हूँ। श्रीजयदेव गोस्वामीको मानव-लीला सम्वरण किये हुए अनेक शताब्दियाँ बीत चुकी हैं; किन्तु आज भी उनके तिरोभावके स्मरणमें कान्दुली-ग्राममें प्रतिवर्ष माघ महीनेमें मकर-संक्रान्तिसे आरम्भ होकर एक विराट् मेला लगता है। उस मेलेमें पचास-साठ हजारसे एक लाख तक लोग सम्मिलित होकर श्रीजयदेव गोस्वामीकी समाधि मन्दिरमें उपासना करते हैं और उस समय सभी वैष्णव लोग मिलकर श्रीराधाकृष्णके मिलन विषयक श्रीजयदेव गोस्वामीके काव्यका पठन-पाठन करते हैं।
[त] श्रीगीतगोविन्दम् श्रीगीतगोविन्दकी टीकाएँ श्रीगीतगोविन्दकी निम्नलिखित छह प्रसिद्ध टीकाएँ प्राप्त होती हैं— १. रसमञ्जरी—इसके प्रणेता महामहोपाध्याय शंकरमिश्र हैं। उन्होंने इस टीकाका प्रणयन श्रीशालीनाथकी प्रेरणासे किया था। २. रसिकप्रिया—इस व्याख्याके प्रणेता कुम्भनृपति कुम्भकरण थे। ये मेवाड़के राजा थे। इनके राज्यकालका समय ईसाकी चौदहवीं शताब्दीका प्रथम चरण माना जाता है। ३. सञ्जीवनी—इसके प्रणेता वनमाली भट्ट हैं। ४. पदद्योतनिका—इसके प्रणेता नारायण भट्ट हैं। ५. बालबोधिनी—इसके प्रणेता श्रीपुजारी गोस्वामी हैं। ६. दीपिका—इसके प्रणेता आचार्य गोपाल हैं। इस ग्रन्थकी मूल प्रतिलिपिका संकलन श्रीमान् भक्तिवेदान्त तीर्थ महाराजने बड़े परिश्रमसे किया है। उन्होंने इस अभिनव संस्करणका ढाँचा प्रस्तुत किया। तत्पश्चात् बेटी श्रीमती मधु खण्डेलवाल एम. ए., पीएच. डी. ने इसकी भाषाका संशोधन और अलंकृत कर मानो इसमें प्राणशक्तिका संचार किया है। यही नहीं अपितु सौभाग्यवती बेटीने बड़े परिश्रमसे इस गीतगोविन्द-ग्रन्थके दुर्लभ किन्तु अतिशय सुन्दर और भावपूर्ण श्रीविनयमोहन सक्सेना, दिल्ली निवासी द्वारा रचित पद्यानुवाद खोजकर इसमें सन्निहित किया है। इसका यह कार्य अत्यन्त सराहनीय है। श्रीभक्तिवेदान्त माधव महाराजजीने तथा श्रीओमप्रकाश ब्रजवासी एम. ए., एल. एल. बी., साहित्यरत्नने इसका विशेषरूपसे प्रूफ-संशोधन किया है। श्रीमान् सुबलसखा ब्रह्मचारी और श्रीपुरन्दर ब्रह्मचारीने कम्प्यूटरसे इसकी प्रतिलिपि प्रस्तुत की है। विशेषतः श्रीमान् पुण्डरीक ब्रह्मचारी तथा
प्रस्तावना [थ] सौभाग्यवती वृन्दादेवीने मेरे साथ रहकर बड़े परिश्रमसे इस ग्रन्थका प्रूफ-संशोधन किया है। मैं श्रीजयदेव गोस्वामी तथा उनकी परमाराध्या श्रीराधिका एवं ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीश्यामसुन्दरके चरणोंमें प्रार्थना करता हूँ कि वे उनपर अहैतुकी कृपा करें, जिससे वे इस प्रसिद्ध काव्यके यथार्थतः अधिकारी बन सकें। शीघ्रतासे इसका प्रकाशन होनेके कारण कुछेक त्रुटियाँ रह गई हैं। कृपालु सहृदय पाठकगण इन त्रुटियोंका संशोधन कर इसके भावार्थको ग्रहण करेंगे और पत्रके माध्यमसे मुझे सूचित करेंगे, जिसका मैं अगले संस्करणमें संशोधन कर सकूँ। फाल्गुन पूर्णिमा श्रीहरि-गुरु-वैष्णव कृपालेश प्रार्थी ५१७ श्रीगौराब्द दीनहीन भारतीयाब्द १९२४, त्रिदण्डिभिक्षु श्रीभक्तिवेदान्त नारायण १८ मार्च २००३ ई.
[अ] विषय—सूची सर्ग पृष्ठ प्रथम — सामोद-दामोदरः १ द्वितीय — अक्लेश केशवः ९१ तृतीय — मुग्ध मधुसूदनः १२५ चतुर्थ — स्निग्ध-मधुसूदनः १५१ पञ्चम — सकांक्ष-पुण्डरीकाक्षः १८१ षष्ठ — धृष्ट-वैकुण्ठः २०९ सप्तम — नागर-नारायणः २२३ अष्टम — विलक्ष-लक्ष्मीपतिः २७२ नवम — मुग्ध-मुकुन्दः २९० दशम — मुग्ध-माधवः ३०४ एकादश— स्वानन्द-गोविन्दः ३३० द्वादश — सुप्रीत-पीताम्बरः ३७५
[आ] चित्र-सूची चित्र सर्ग पृष्ठ १. हरि-राधा मदमाते प्रथम २ २. हरि-मूरतका ध्यान द्वितीय ९४ ३. मैं अपराधी रोक न पाया तृतीय १२८ ४. और सखीकी व्यथा-कथा चतुर्थ १५० ५. तव विरहे वनमाली पंचम १८२ ६. हे हरि, राधा आवास गृहे षष्ठ २१० ७. विफल रूप यौवन नव मेरा सप्तम २२६ ८. मनिनी ! मत अब मान करो नवम २९२ ९. प्रिये चारुशीले ! तजो मान प्यारा दशम ३०६ १०. चल सखि ! चल घनश्याम सदनमें एकादश ३३२ ११. मानिनि ! अपना मान बिसारो द्वादश ३७८ १२. अनुहारमयी राधा द्वादश ३८६ चित्रकारोंकी सूची १. श्रीश्याम रानी दासी (प्रमुख चित्रकार) २. श्रीकृष्णकारुण्य दास (सहायक) ३. श्रीसत्प्रेम दास ( ,, ) ४. श्रीगोपी दासी ( ,, ) ५. श्रीनीलाम्बरी दासी ( ,, ) ६. श्रीसुन्दरी दासी ( ,, ) ७. श्रीकृष्णवल्लभ दासी ( ,, ) ८. श्रीप्रेमानन्दी दासी ( ,, ) ९. श्रीप्रेमवती दासी ( ,, ) १०. श्रीअनिता दासी ( ,, )
[इ] श्लोक-सूची अ पृष्ठ संख्या आ पृष्ठ संख्या अङ्गेष्वाभरणं करोति २१९ आपादलम्बिनीमाला ३९ अङ्गे स्वेदः ११६ आवासो विपिनायते १६१ अक्ष्णोर्निक्षिपदञ्जनं ३४५ आश्लेषचुम्बन २०४ अमल कमल दल लोचन ४४ आश्लेषादनु चुम्बनादनु २०१ अभिनव जलधर ४६ इ अभिव्यक्तान्य तरुणी ८४ इतस्ततस्तामनुसृत्य १२७ अतिक्रम्यापाङ्ग श्रवणपथ ३६८ इति चटुल-चाटु-पटु ३१६ अत्रान्तरे च कुलटा २२३ इत्थं केलिततीर्विहृत्य ४१२ अत्रान्तरे मसृण-रोष ३०४ इहं रस-भणने कृत २५४ अथ सा निर्गत बाधा ३९६ ई अथ कथमपि यामिनीं २७२ ईषद् विकसितै गण्डैः ७७ अथ तां गन्तुमशक्तां २०९ ईषन्मीलितदृष्टि मुग्ध ३९५ अथागतां माधवमन्तरेण २३५ उ अधिगतमखिल-सखी ३३९ उन्मद मदन मनोरथ ६० अधर-सुधारसमुपनय ३८२ उन्मीलनमधुगन्ध ७१ अद्योत् सङ्ग वसद् भुजङ्ग ६९ उरसि मुरारेरुपहित १९४ अन्तर्मोहन-मौलि-घूर्णन २८७ उल्काभवति सा यस्या ५३,१०५ अनिल-तरल-किसलय ३३६ क अनिल-तरल-कुवलय २५८ कंसारिरपि संसार १२५ अनेक नारी परिरम्भ ७३ कति न कथितमिदम् २९४ अनुरागोऽनुरक्तायां १०८ कथित समयेऽपि २२५ अमृत-मधुर-मृदुतर २६० कन्दर्प ज्वर १७५ अलसनिमीलित ११२ कनक निकष रुचि २६२ अलिकुल गञ्जन ३९९ कर कमलेन करोमि ३७९ अविरल-निपतित १५४ करतल ताल तरल ८२ अहह कलयामि २३० कालिय विषधर ४१ अहमिह निवसामि २३२ कापिविलास विलोल ७९ अहमिह निवसामि १८१ कापि कपोल तले ८० कज्ज्वल मलिन विलोचन २७७
[ई] पृष्ठ संख्या पृष्ठ संख्या काश्मीर गौर वपु ३४६ चन्द्रक चारु मयूर ९६ किं करिष्यति १३० चरण कमल गलदलक्तक २७९ किं विश्राम्यसि कृष्ण २२१ चरण किसलये कमया २५२ किमिति विषीदसि २९५ चरण रणित मणि ११४ किशलय शयन तले ३७६ चिन्तयामि तदाननं १३१ किशलय शयन निवेशितया १११ चेष्टा भवति पून्नार्यो १०९ कुरु यदुनन्दन! चन्दन ३९७ छ कुसुम विशिख शर १५५ छलयसि विक्र्मणे १७,२५ कुसुम सुकुमार २३१ ज कुसुमचय रचित शुचि ३५० जनकसुताकृतभूषण ४५ कृष्णोऽपि तं दन्तवक्रं ५५ जनयसि मनसि २९७ केलिकला कुतुकेन ८१ जयश्रीविन्यस्तैर्महित ३७१ कोकिल कलरव ११३ जलदपटलबलबिन्दु ९९ क्लेशकर्म विपाका ९२ जित विस शकले मृदु २४९ क्षितिरति विपुलतरे १७,२१ त क्षत्रिय रुधिरमये १७,२६ तत्किं कामपि २३३ क्षणमपि विरहः १७७ तन्विखिन्नमसूचया १३३ क्षम्यतापरं १३५ तरल-दृगञ्चल-चलन ३६२ ग तवकरकमलवरे १७,२४ गणयति गुणग्रामं भ्रामं १०४ तवचरणेप्रणता ४७ गतवति सखीवृन्दे ३७५ तवेदं पश्यन्त्याः २८५ गोपकदम्ब नितम्बवती ९७ तस्याः पाटलपाणिजाङ्कित ३९१ घ तानिस्पर्शसुखानि १४५ घटयति सुघने कुच युग २४८ तामथ मन्मथ खिन्नां २९० घनचय रुचिरे रचयति २४६ तामहं हृदि सङ्ग १३२ घन जघन स्तन ३३४ तालफलादपि २९४ च तिर्यक् कण्ठ विलोल १४७ चञ्चल कुण्डल २४० त्वमसि मम भूषणं ३०९ चन्दन चर्चित नील ७४,७५ त्वां चित्तेन चिरं ३५५ त्यजति न पाणि तलेन १६७
[उ] पृष्ठ संख्या पृष्ठ संख्या त्वद्राम्येन समं २०० प त्वदभिसरण २१२ पर्यङ्कीकृत नाग नायक ४१३ त्वरितमुपैति न २१४ पद्मापयोधर तटी ४९ त्वामप्राप्य मयि ४१३ पाणौ मा कुरु चूत १३९ द पीनपयोधरभार ७७ दिनमणिमण्डल ४० प्रतिपदमिदमपि १५८ दयित विलोकित २४० पूर्वं यत्र समं त्वया १८८ दर विदलित मल्ली ६८ पतति पतत्रे विचलति १९३ दशन-पदं भवदधर २८१ पश्यति दिशि दिशि २११ दहति शिशिर मयूखे १८५ परिहर कृतातङ्के ३१७ दिशि दिश किरति १६६ प्रीतिं वस्तनुतां हरिः ३२७ दुरालोकः स्तोक १२१ प्रत्यूहः पुलकांकुरेण ३८७ दृश्यसे पुरतो गतागत १३४ प्रथम समागम लज्जितया ११० दृशौ तव मदालसे ३२५ प्रलयपयोधिजले १६, १८ दोर्भ्यां संयमितः पयोधर ३८८ प्रसरति शशधर २२४ ध प्राणेश्वरं प्रणय २९१ ध्यानलयेन पुरः १५९ प्रातर्नील निचोलम् २६९ ध्वनति मधुप समूहे १८५ प्रिय-परिरम्भण-रभस ३८१ न प्रियं व्यक्ति पुरोऽन्यत्र ८४ नयन विषयमपि १६८ ब नव-भवदशोक-दल ३४९ बन्धूकद्युति-बान्धवो ३२३ नाभिमूल कुचोदर १०९ बहिरिव मलिनतरं २८२ नामसमेतं कृत सङ्केतं १९२ बाधां विधेहि २६८ नायातः सखि ! निर्दयो २५५ भ नितम्बिनी चुम्बित १९ भजन्त्यास्तल्पान्तं ३६९ निद्राकषाय २८५ भणति कवि जयदेव १८७ निन्दति चन्दनमिन्दु १५२ भवति विलम्बिनी २१६ निन्दसि यज्ञ विधेरहह १८, ३० भ्रमति भवानवला २८३ निभृत निकुञ्ज गृहं १०६ भ्रमरचयं रचयन्तमुपरि ४०१ नील नलिनाभमपि ३११ भ्रूचापे निहितः कटाक्ष १४३
[ऊ] पृष्ठ संख्या पृष्ठ संख्या भ्रूपल्लवो धनुरपाङ्ग १४१ र म रचय कुचयो पत्रश्चित्रं ४०६ मञ्जुतर-कुञ्जतल ३४९ रजनि-जनित-गुरु २७३ मणिमय मकर मनोहर १०१ रतिगृहजघने २५० मदन महीपति कनक ६२ रतिसुख समय ११५ मधु मुदित-मधुप-कुल ३५३ रतिसुखसारे १९० मधुमुर नरक विनाशन ४३ रमयति सुभृशं कामपि २५३ मधुरतर पिक-निकर ३५४ राधामुग्धमुखारविन्द २०५ मनोभवानन्दन २६५ राधावदन-विलोकन ३५८ मम मरणमेव वरमिति २२८ रासोल्लास भरेण ८८ मम रुचिरे चिकुरे कुरु ४०३ रिपुरिव सखी संवासोऽयं २६६ माध्विका परिमल ६५ ल मामतिविफलरुषा ३८४ ललित लवङ्ग लता ५६,५७ मामहह विधुरयति २२९ व मामियं चलिता विलोक्य १२९ वदनकमल-परिशीलन ३६३ माराङ्के रति-केलि-सङ्कुल ३९० वदन-सुधानिधि गलितम् ३८० मुखरमधीरं त्यज १९३ वदसि यदि किञ्चिदपि ३०५ मुग्धे विधेहि मयि ३१९ वपुरनुहरति तव-स्मर २७८ मुहुरवलोकित मण्डन २१३ वर्णित जयदेवकेन १३६ मृगमद-रस-वलितं ४०२ वसति दशनशिखरे १७,२२ मृगमद सौरभ ६१ वसति विपिन विताने १८६ मृदुचल मलय पवन ३५१ वसन्ते वासन्ती कुसुम ५१ मेघैर्मेदुरमम्बरं १ वहति च चलित १५६ म्लेच्छ निवह निधने १८,३१ वहति मलय समीरे १८४ य वहसि वपुषि विशदे १७,२९ यद्गान्धर्व-कलासु ४०८ वाग्देवताचरित ८ यदनुगमनाय निशि २२७ वाचः पल्लव १३ यदि हरि स्मरणे ११ विकसित-सरसिज २५९ यमुनातीर वानीर १५१ विकिरति मुहुः १९८ यह्रम्बुजाक्षापससार ५५ विगलित लज्जित ६३
[ऋ] पृष्ठ संख्या पृष्ठ संख्या विगलित वसनं परिहृत १९५ श्रीजयदेव भणितम् ६७,८४, विचलदल कललितानन २३९ १०३,११७,१६०,१७० वितत बहु बल्लिनव ३५२ श्रीजयदेव-भणितमति २९८ वितरसि दिक्शरणे १७,२७ श्रीजयदेव-भणितमधरीकृत ३४१ विपुल पुलक पालिः २१७ श्रीजयदेव-भणितमिदमनुपद ३८५ विपुल-पुलक-पृथु २४१ श्रीजयदेव-भणित-रति २८४ विपुल-पुलक-भर ३६५ श्रीजयदेव-भणित-वचनेन २६४ विपुल पुलक भुज ९८ श्रीजयदेव भणित हरि २४३ विरचित-चाटु-वचन ३३१ श्रीजयदेव वचसि रुचिरे ४०५ विरह-पाण्डु-मुरारि २४४ श्रीजयदेवे कृत-हरि १९७ विलिखति रहसि १५७ श्रीभोजदेव प्रभवस्य ४१४ विशद कदम्बतले १०२ शृणुरमणीतरं ३३५ विश्वेषामनुरञ्जनेन ८५ श्लिष्यति कामपि चुम्बति ८३ विहरति वने राधा ९१ श्लिष्यति चुम्बति २१५ विहित पद्मावती सुख ३५४ श्वसित पवनमनुपम १६६ विहित विशद-विस २१३ स वृष्टि-व्याकुल गोकुलावन १७८ सकल-भुवन-जन-वर २६३ वेदानुद्धरते जगन्ति १८,३४ सजल-जलद-समुदय २६२ व्यथयति वृथा मौनं ३२२ सजल-नलिनीदल २९७ व्यालोलः केशपाशः ३९३ सञ्चरदधर सुधा ९३ श सत्यमेवासि यदि ३०८ शशिमुखे ! तव भाति ३२० समय-चकितं २०४ शशिकिरण-च्छुरितोदर ३६४ समर समरोचित विरचित २३७ शशिमुखि ! मुखरय ३८३ समुदित मदने रमणी २४५ शिखण्ड बर्होच्चय ५६ सरस घने-जघने-मम ४०४ श्यामल-मृदुल-कलेवर ३६१ सरस मसृणमपि १६५ श्रमजलकण-भर २४२ साकूत स्मितमाकुलाकूल १२२ श्रितकमलाकुच ३६,३८ साध्वी माध्वीक ४०९ श्रीजयदेवकविभणित विभव ३६७ सान्द्रानन्द पुरन्दरादि ३०१ श्रीजयदेवकवेरिदम् ३३,४८,२१७ सा रोमाञ्चति शीत्करोति १७१
[ए] पृष्ठ संख्या पृष्ठ संख्या सा मां द्रक्ष्यति वक्ष्यति ३४३ स्मर-शर-सुभग-नखेन ३४० सा ससाध्वस सानन्दं ३५७ स्मरातुरां दैवत वैद्य १७४ सानन्दं नन्दसूनुर्दिशतु ३७१ ह सुचिरमनुनयेन ३३० हस्त स्रस्त विलास ११९ सौन्दर्यैकनिधेरनङ्ग ३७३ हरि चरण शरण २३२ स्तन विनिहितमपि १६४ हरि परिरम्भण वलित २३८ स्तम्भः स्वेदोऽथ १७२ हरिरभिमानी १९६ स्थल-कमलगञ्जनं ३१३ हरिरभिसरति वहति २९३ स्थल-जलरुह-रुचि २६१ हरिरिति हरिरिति जपति १६९ स्थानेयानासने ७७ हरिरुपयातु वदति २९८ स्निग्धे यत्परुषाणि २९९ हरि हरि याहि २७४ स्फुरतु कुचकुम्भ ३१२ हारममलतर-तारमुरसि ३६० स्फुरदतिमुक्तालता ६६ हारावली-तरल-काञ्चन ३४८ स्फुरतुमनङ्ग-तरङ्ग ३३७ हृदि विसलता हारो १३७ स्मर-गरल-खण्डनं ३१५ हे मनोहर वेष धारिन् ४००
इस चित्र में कोई पाठ (text) या सामग्री उपलब्ध नहीं है (चित्र पूर्णतः रिक्त/सफ़ेद है)।
श्रीश्रीगुरु-गौराङ्गौ-जयतः श्रीश्रीगीतगोविन्दम् प्रथमः सर्गः सामोद-दामोदरः मेघैर्मेदुरमम्बरं वनभुवः श्यामास्तमालद्रुमै- र्नक्तंभीरुरयं, त्वमेव तदिमं राधे! गृहं प्रापय। इत्थं नन्दनिदेशतश्चलितयोः प्रत्यध्वकुञ्जद्रुमं राधामाधवयोर्जयन्ति यमुनाकूले रहः केलयः ॥१ ॥ अन्वय—[कदाचित् बालगोपालेन सह गोष्ठस्थितो नन्दः सायं समये मेघाडम्बरमालोक्य स्वयं कार्यान्तरव्यासक्ततया नन्दनं गृहं नेतुमशक्तः किमपि कार्यमुद्दिश्य तत्रोपस्थितां राधां प्रति आह];—अम्बरं (आकाशतलं) मेघैः मेदुरं (निविड़- तमसाच्छन्नतया सान्द्र-स्निग्धं) वनभुवः (आरण्य-प्रदेशाः) तमालद्रुमैः (घनसन्निविष्टैः तमालवृक्षैः) श्यामाः (गाढ़नीलवर्णाः) [तथा च] अयं [मम शिशुः] नक्तं (सप्तम्यन्तमव्ययम्, रात्रौ इत्यर्थः) भीरुः (नितरां भयशीलः) (पूर्वरात्रे) त्वां विहाय अन्याभिः कृतरमणापराधतया त्वत्कृत-बहु-नायिकावल्लभा- रोपणाशङ्की अतएव भीरुः]; तत् (तस्मात्) हे राधे, त्वमेव इमं (बालगोपालं) गृहं (आलयं) प्रापय (नय); इत्थं (एवं) नन्दनिदेशतः (नन्दस्य आज्ञया); [अथवा नन्दयतीति नन्दः, नन्दश्चासौ निदेशश्चेति नन्दनिदेशः श्रीराधासखावचनं तस्मात्] प्रत्यध्वकुञ्जद्रुमं (कुञ्जेनोपलक्षितो द्रुमः कुञ्जद्रुमः, अध्वनः कुञ्जद्रुमोऽध्वकुञ्ज-द्रुमः, तं लक्षीकृत्य तत्रेत्यर्थः) चलितयोः (प्रस्थितयोः) राधामाधवयोः यमुनाकूले रहःकेलयः (विजनविहाराः)
“हरि-राधा मदमाते। यमुन-पुलिनके कुंज-कुंजसे क्रीड़ा करते जाते।”
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३ जयन्ति (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तन्ते)। [श्रीकृष्णस्य स्वयं भगवत्त्वेन सर्वावतारेभ्यः, श्रीराधायाश्च सर्वलक्ष्मीमयत्वेनास्य सर्वप्रेयसीभ्यः श्रेष्ठ्यात् इतिभावः; तथाचोक्तं सूतेन “एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्” इति।] वृहद्-गोतमीये च-“देवी कृष्णामयी प्रोक्ता राधिका परदेवता सर्वलक्ष्मीमयी सर्वस्यान्तः- संमोहिनी परा” इति ॥१॥ अनुवाद—हे राधे! समस्त दिशाएँ घनघोर घटाओंसे आच्छादित हो गई हैं। वन वसुन्धरा श्यामल तमाल विटपावलीकी प्रतिच्छायासे तिमिरयुक्ता हो गई है। भीरु स्वभाववाले कृष्ण इस निशीथमें एकाकी नहीं जा सकेंगे—अतः तुम इन्हें अपने साथ ही लेकर सदनमें पहुँचो। श्रीराधाजी, सखी द्वारा उच्चरित इस वचनका समादर करती हुई आनन्दातिशयतासे विमुग्ध हो, पथके पार्श्वमें स्थित कुञ्ज- तरुवरोंकी ओर अभिमुख हुई और कालिन्दीके किनारे उपस्थित होकर एकान्तमें केलि करने लगीं। श्रीयुगल माधुरीकी यह रहस्यमयी लीला भक्तोंके हृदयमें स्फुरित होकर विजयी हो। पद्यानुवाद— मेघ भरित अम्बर अति श्यामल तरु तमालकी छाया, कान्ह भीरु ले जा राधे! गृह, व्याप्त रातकी माया। पा निर्देश यह नन्द महरका हरि-राधा मदमाते, यमुन-पुलिनके कुञ्ज-कुञ्जमें क्रीड़ा करते जाते ॥१॥ बालबोधिनी—गीतगोविन्द नामक इस प्रबन्धमें श्रीराधा- माधवकी ऐकान्तिकी प्रेममयी निकुञ्ज लीलाका चित्रण किया गया है। रचनाकार महाकवि श्रीजयदेव गोस्वामीने श्रीराधामाधवकी स्मरकेलि-लीलाका वर्णन कर उन दोनोंकी सर्वश्रेष्ठता स्थापित की है। ग्रन्थकृतिके प्रारम्भमें श्रीकविराजजीने तमालवृक्षके तमःपुञ्ज द्वारा समाच्छादित कुञ्ज-भवनमें श्रीराधा-माधवकी प्रविष्टिका चित्रण किया है।
४ श्रीगीतगोविन्दम् परम प्रेयसी श्रीराधा अपनी सखीके वचनोंका स्मरण कर श्रीकृष्णको साथ लेकर कुञ्जमें प्रवेश कर जो सुखक्रीड़ाएँ करती हैं, उन्हींको मङ्गलाचरणके रूपमें प्रस्तुत किया गया है। ग्रन्थका प्रतिपाद्य-तत्त्व श्रीराधामाधवकी लीलामाधुरी है; अतः यह प्रबन्ध सभीके लिए मङ्गलदायी और कल्याणकारी है। ‘मेघैर्मेदुरमम्बरम्’ इस श्लोकमें कह रहे हैं कि श्रीराधामाधवकी सर्वोत्कृष्ट रहःकेलि जययुक्त हो। ‘माधव’ पदके द्वारा इस कार्यकी सूचना दी गई है कि यद्यपि श्रीभगवान् लक्ष्मीपति हैं फिर भी उनका श्रीराधामें ही प्रेमाधिक्य है। श्रीकृष्ण स्वयं-भगवान् हैं, सर्व-अवतारी हैं; सभी अवतारोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं; श्रीमद्भागवतमें श्रीसूतजीने ऐसा ही निर्णय किया है। श्रीबृहद्गौतमीय तन्त्रमें कहा गया है— “देवी कृष्णमयी प्रोक्ता राधिका परदेवता। सर्वलक्ष्मीमयी सर्वस्यान्तःसंमोहिनी परा।” श्रीमती राधिका द्योतमाना, परमा सुन्दरी हैं। ये कृष्णक्रीड़ाकी वसति नगरी अर्थात् आश्रय स्वरूपा हैं। कृष्णमयी—कृष्ण इनके भीतर-बाहर अवस्थित रहते हैं। निरन्तर कृष्णकी अभिलाषा पूर्ण करती हैं; समस्त देवताओंमें सर्वश्रेष्ठा हैं; समस्त लक्ष्मियोंमें परम लक्ष्मी-स्वरूपा हैं। सभीकी हृदय-स्वरूपा हैं, श्रीकृष्ण-चित्ताकर्षका हैं, परा हैं। ये श्रीश्रीराधामाधव इस काव्य-रचनाकी निर्विघ्न परिसमाप्तिके लिए अनुग्रह प्रदान करें—इस प्रकार कविके द्वारा शिष्टाचार परम्पराका निर्वाह किया गया है। जय शब्दसे तात्पर्य है—लीलाओंका सर्वोत्कृष्ट और भक्तजनोंके द्वारा नमस्करणीय होना। ये लीलाएँ भगवान्की स्वरूपशक्तिकी वृत्तिरूपा हैं, अतः ये जययुक्त हों। अब प्रश्न होता है कि कौन-सी लीलाएँ जययुक्त हों ? इसके उत्तरमें कहा है—यमुनाकूले—यमुनाके तटपर अवस्थित
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ५ श्रीराधामाधवकी कुञ्जगृहकी लीला जययुक्त हों। इस पदके द्वारा रतिजनित श्रमको दूर करने वाला शिशिर समीर सम्प्राप्ति युक्तत्वको सूचित किया गया है। यह कुञ्ज तमाल वृक्षोंके द्वारा सघन रूपसे आच्छादित होकर श्यामवर्ण हो गया है, इसको लक्ष्य करके पथका निर्देश किया गया है। 'नन्दनिदेशतः'—नन्द अर्थात् जो सबके आनन्दका विधान करते हैं। नन्दश्चासौ निदेशश्चेति—इस प्रकारसे यह नन्दमहाराजका निर्देश भी कहा जा सकता है। इस पदसे यह भी इङ्गित होता है कि जो सदासर्वदा आनन्दमें डूबे हुए हैं, उन नन्दनन्दनका निर्देश पाकर। यद्यपि 'नन्दनिदेशतः' पदके बहुत प्रकारके अर्थ बतलाये गये हैं, फिर भी उक्त पदका अभिप्राय "परम प्रेयसी श्रीराधा अपनी सखीके वचनोंको सुनकर" ही समुचित लगता है, क्योंकि महाराज नन्दका श्रीमती राधाको श्रीकृष्णके साथ कुञ्जमें विहार करनेके लिए आदेश देना कुछ अटपटा-सा रसाभास-सा प्रतीत होता है। वैसे ही स्वयं श्रीकृष्णका वैसा आदेश भी अटपटा ही प्रतीत होता है। यहाँ यही अभिप्रेत है कि सखीवचनका समादर करती हुई श्रीराधिका कृष्णको साथ लेकर चलने लगीं। सखीवचन—हे राधे ! यह कृष्ण भीरु स्वभावयुक्त हैं क्योंकि पिछली रात तुम्हें छोड़कर दूसरी नायिकाके साथ मिलित हुए थे, अपने इस अपराधके कारण तुमसे डरे हुए हैं, उनका भयभीत होना स्वाभाविक ही है। तुम्हारे द्वारा लगाया गया अपराध 'बहु नायिका-वल्लभ' ठीक ही है, अब तुम ही मर्मपीडित श्रीकृष्णको अपनेमें प्राप्त कराओ। 'गृहं प्रापय'—हे राधे ! श्रीकृष्णको लेकर गृहं प्रापय अर्थात् मञ्जु वृक्षोंसे सुशोभित केलि सदनमें प्रवेश करो, क्योंकि यही तुम्हारे लिए अनुकूल है। अथवा घरमें ले जाओ अर्थात् कुञ्जगृहमें प्रवेश कराकर गृहस्थ अर्थात्
६ श्रीगीतगोविन्दम् अपनेमें मिलाकर गृहिणी मान कराओ। 'गृहं प्रापय' इस वाक्यके 'गृह' शब्दमें तटस्थ लक्षणा है और 'गृह' शब्द गृहमें रहनेवाली गृहिणीरूपी अर्थको लक्षित करता है तथा प्र-पूर्वक 'आप' धातु उदयार्थक है। 'एव' कारके द्वारा—इनकी भार्या होने योग्य केवल तुम ही हो। यदि कोई कहे कि उनकी भार्या तो रुक्मिणी हैं क्योंकि कुण्डिन नगरवासी जनोंने रुक्मिणीको आशीर्वाद दिया था—'तुम श्रीकृष्णकी भार्या बनो।' इसी प्रकार हे राधे ! तुम भी इनकी भार्या बनो, क्योंकि वह गृह, गृह नहीं जिसमें गृहिणी न हो। श्रीराधिका सखीसे कहती हैं, इस ज्योत्स्नामयी रात्रिमें जनसमूहके मध्य होकर श्रीकृष्णके साथमें कैसे जाऊँ? तदुत्तर कविने अनुकूल समयका चयन किया है। तदनुसार—हे राधे ! सम्प्रति आकाश बादलोंसे भरे हुए होनेके कारण मनोज्ञ हो गया है, जिससे चन्द्रमाकी किरणें अदृश्य हो रही हैं, श्रीकृष्णकी प्रिया-मिलनकी इच्छाको जानकर घटाओंने मानो चन्द्रमाको समाच्छादित कर लिया है। अथवा जिस प्रकार श्यामवर्णके मेघोंने गौरवर्ण चन्द्रमाका आलिङ्गन कर रखा है, उसी उद्दीपनसे विभावित हो श्रीश्याम गौराङ्गी श्रीराधासे मिलनेकी तीव्र इच्छासे उत्कण्ठित हो रहे हैं। यह समय भी अनुकूल है। रात्रिकी बेला है, वनभूमि तमाल वृक्षोंसे समाच्छादित होकर श्यामवर्ण हो गई है, चहुँओर निविड़ अन्धकार व्याप्त है, कोई तुम्हें देख नहीं सकता। डरनेकी तनिक भी आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार महाकविने सूचित किया है कि इस काव्यका अङ्गी-रस रसराज शृङ्गार है। अन्धकारमय रात्रिकाल, मेघाच्छादित अम्बर तथा तमाल वृक्षोंसे सुशोभित शस्यश्यामला वनभूमि—ये उद्दीपन विभाव हैं; श्रीमती राधा आलम्बन विभाव हैं। रति स्थायी भाव है। हर्ष, आवेग, औत्सुक्य आदि व्यभिचारी
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ७ भाव हैं। भीरुत्व अनुभाव है। शृङ्गार-रसमें नायिकाका प्राधान्य होनेके कारण श्रीराधाजीका यहाँ पहले निरूपण हुआ है। इस लीलाके अवसर पर सखी इस प्रकार कहेगी-चारों ओर देख सुनकर चलना उचित है—इत्यादि। इन वचनोंसे—'राधे! जब तक चन्द्र-ज्योत्स्ना दृश्यमाना नहीं होती, तब तक वनमें प्रविष्ट हो जाओ।' श्रीमद्भागवतमें श्रीशुकदेवजीने १०-३० में कहा है—'अन्धकारमय स्थानको देखकर'। प्रस्तुत श्लोकमें जयति शब्दके द्वारा नमस्कारका बोध होता है, ऐसे काव्य-प्रकाशमें भी नमस्कार शब्दसे सूचित किया है। यहाँ श्रीराधामाधवकी रहःकेलिका जो प्रतिपादन हुआ है, उससे वस्तु निर्देश भी लक्षित होता है तथा यह आशीर्वाद स्वरूप भी है। इसलिए इसे महाकाव्य कहा जाता है। काव्यके विषयमें चर्चा करने पर देखा जाता है कि काव्य ग्रन्थ दो प्रकारके हैं- साधारण काव्य एवं महाकाव्य। महाकाव्यके मङ्गलाचरण श्लोकमें तीन पक्षोंका वर्णन हुआ है—आशीर्वाद, नमस्कार एवं वस्तुनिर्देश। काव्यादर्शमें सर्गबन्धको महाकाव्य कहा गया है। प्रस्तुत श्लोकमें श्रीराधामाधवकी रहःकेलिका प्रतिपादन हुआ है। अतः यह वस्तुनिर्देशात्मक मङ्गलाचरण है, राधामाधव कहनेसे दोनोंका अविच्छिन्न नित्य सम्बन्ध प्राप्त होता है। राधाकृष्ण दुहे एक ही स्वरूप। लीलारस आस्वादिते धरे दुइ रूप॥ श्रीचैतन्यचरितामृतमें वर्णित इस पयारके अनुसार श्रीराधाकृष्ण दोनोंमें अव्यभिचारी सम्बन्ध सूचित होता है। ऋक् परिशिष्टमें कहा है—राधया माधवो देवो माधवेनैव श्रीराधिका—राधाके साथ माधव एवं माधवके साथ श्रीराधिका विराजमान हैं। राधामाधव इस पदमें द्वन्द्व समासके द्वारा दोनोंका अभिन्न सम्बन्ध प्रकाशित होता है।
८ श्रीगीतगोविन्दम् इस श्लोकके पूर्वार्द्धमें समुच्चयालङ्कार तथा उत्तरार्द्धमें आशीः अलङ्कार है। फलतः दोनोंकी संसृष्टि है। प्रस्तुत श्लोकमें वैदर्भी रीति, कैशिकी वृत्ति, सम्भाविता गीति, मध्य लय, प्रसाद गुण, अनुकूल नायक तथा स्वाधीनभर्त्तृका नायिका है। इस श्लोकके पूर्वार्द्धमें अभिलाष लक्षण विप्रलम्भ शृङ्गार है तथा शार्दूल-विक्रीड़ित छन्द है॥१॥ वाग्देवताचरितचित्रितचित्तसद्मा पद्मावतीचरणचारणचक्रवर्ती। श्रीवासुदेवरतिकेलिकथासमेतमेतं करोति जयदेवकविः प्रबन्धम्॥२॥ अन्वय—वाग्देवताचरितचित्रितचित्तसद्मा (वाग्देवतायाः सरस्वत्याः चरितेन चित्रितं सुशोभितं चित्तमेव सद्म भवनं यस्य तादृशः; सर्वविद्याविशारद इत्यर्थः; यद्वा वाचां वक्तव्यत्वेन उपस्थितानां तत्केलिमयीनां देवता वक्ता प्रवर्त्तकश्च श्रीकृष्णः तच्चरितेन चित्ररूपेण लिखितं चित्तरूपं सद्म गृहं यस्य सः); [तथा] पद्मावतीचरणचारणचक्रवर्त्ती (पद्मावत्याः लक्ष्म्याः चरणयोः निमित्त भूतयोरेव चारणचक्रवर्त्ती नर्त्तकश्रेष्ठः; श्रियोऽपि प्रियसेवक इत्यर्थः); जयदेवकविः श्रीवासुदेवरतिकेलिकथासमेतं (श्रीवासुदेवस्य वासुनारायणः सचासौ देवश्चेति विग्रहः; श्रीवसुदेवसुतस्य वा रतिकेलिः सुरतोत्सवः तस्य कथा कीर्त्तनं तत्समेतं) एतं प्रबन्धं (ग्रन्थं) करोति॥२॥ अनुवाद—जिनके चित्त-सदनमें समस्त वाणियोंके नियन्ता श्रीकृष्णकी चरितावली सुचारु रूपसे चित्रित हो रही है, जो श्रीराधाजीके चरणयुगल प्राप्तिकी लालसामें निरन्तर नृत्यविधिके अनुसार निमग्न हो रहे हैं, ऐसे महाकवि जयदेव गोस्वामी श्रीकृष्णकी कुञ्ज-विहारादि सुरत लीला समन्वित इस गीतगोविन्द नामके ग्रन्थका प्रणयन कर भावग्राही भक्तजनोंके उज्ज्वल भक्तिरसको उच्छलित कर रहे हैं॥२॥