गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ श्रीगीतगोविन्दम् अपनेमें मिलाकर गृहिणी मान कराओ। 'गृहं प्रापय' इस वाक्यके 'गृह' शब्दमें तटस्थ लक्षणा है और 'गृह' शब्द गृहमें रहनेवाली गृहिणीरूपी अर्थको लक्षित करता है तथा प्र-पूर्वक 'आप' धातु उदयार्थक है। 'एव' कारके द्वारा—इनकी भार्या होने योग्य केवल तुम ही हो। यदि कोई कहे कि उनकी भार्या तो रुक्मिणी हैं क्योंकि कुण्डिन नगरवासी जनोंने रुक्मिणीको आशीर्वाद दिया था—'तुम श्रीकृष्णकी भार्या बनो।' इसी प्रकार हे राधे ! तुम भी इनकी भार्या बनो, क्योंकि वह गृह, गृह नहीं जिसमें गृहिणी न हो। श्रीराधिका सखीसे कहती हैं, इस ज्योत्स्नामयी रात्रिमें जनसमूहके मध्य होकर श्रीकृष्णके साथमें कैसे जाऊँ? तदुत्तर कविने अनुकूल समयका चयन किया है। तदनुसार—हे राधे ! सम्प्रति आकाश बादलोंसे भरे हुए होनेके कारण मनोज्ञ हो गया है, जिससे चन्द्रमाकी किरणें अदृश्य हो रही हैं, श्रीकृष्णकी प्रिया-मिलनकी इच्छाको जानकर घटाओंने मानो चन्द्रमाको समाच्छादित कर लिया है। अथवा जिस प्रकार श्यामवर्णके मेघोंने गौरवर्ण चन्द्रमाका आलिङ्गन कर रखा है, उसी उद्दीपनसे विभावित हो श्रीश्याम गौराङ्गी श्रीराधासे मिलनेकी तीव्र इच्छासे उत्कण्ठित हो रहे हैं। यह समय भी अनुकूल है। रात्रिकी बेला है, वनभूमि तमाल वृक्षोंसे समाच्छादित होकर श्यामवर्ण हो गई है, चहुँओर निविड़ अन्धकार व्याप्त है, कोई तुम्हें देख नहीं सकता। डरनेकी तनिक भी आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार महाकविने सूचित किया है कि इस काव्यका अङ्गी-रस रसराज शृङ्गार है। अन्धकारमय रात्रिकाल, मेघाच्छादित अम्बर तथा तमाल वृक्षोंसे सुशोभित शस्यश्यामला वनभूमि—ये उद्दीपन विभाव हैं; श्रीमती राधा आलम्बन विभाव हैं। रति स्थायी भाव है। हर्ष, आवेग, औत्सुक्य आदि व्यभिचारी