भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ७ भाव हैं। भीरुत्व अनुभाव है। शृङ्गार-रसमें नायिकाका प्राधान्य होनेके कारण श्रीराधाजीका यहाँ पहले निरूपण हुआ है। इस लीलाके अवसर पर सखी इस प्रकार कहेगी-चारों ओर देख सुनकर चलना उचित है—इत्यादि। इन वचनोंसे—'राधे! जब तक चन्द्र-ज्योत्स्ना दृश्यमाना नहीं होती, तब तक वनमें प्रविष्ट हो जाओ।' श्रीमद्भागवतमें श्रीशुकदेवजीने १०-३० में कहा है—'अन्धकारमय स्थानको देखकर'। प्रस्तुत श्लोकमें जयति शब्दके द्वारा नमस्कारका बोध होता है, ऐसे काव्य-प्रकाशमें भी नमस्कार शब्दसे सूचित किया है। यहाँ श्रीराधामाधवकी रहःकेलिका जो प्रतिपादन हुआ है, उससे वस्तु निर्देश भी लक्षित होता है तथा यह आशीर्वाद स्वरूप भी है। इसलिए इसे महाकाव्य कहा जाता है। काव्यके विषयमें चर्चा करने पर देखा जाता है कि काव्य ग्रन्थ दो प्रकारके हैं- साधारण काव्य एवं महाकाव्य। महाकाव्यके मङ्गलाचरण श्लोकमें तीन पक्षोंका वर्णन हुआ है—आशीर्वाद, नमस्कार एवं वस्तुनिर्देश। काव्यादर्शमें सर्गबन्धको महाकाव्य कहा गया है। प्रस्तुत श्लोकमें श्रीराधामाधवकी रहःकेलिका प्रतिपादन हुआ है। अतः यह वस्तुनिर्देशात्मक मङ्गलाचरण है, राधामाधव कहनेसे दोनोंका अविच्छिन्न नित्य सम्बन्ध प्राप्त होता है। राधाकृष्ण दुहे एक ही स्वरूप। लीलारस आस्वादिते धरे दुइ रूप॥ श्रीचैतन्यचरितामृतमें वर्णित इस पयारके अनुसार श्रीराधाकृष्ण दोनोंमें अव्यभिचारी सम्बन्ध सूचित होता है। ऋक् परिशिष्टमें कहा है—राधया माधवो देवो माधवेनैव श्रीराधिका—राधाके साथ माधव एवं माधवके साथ श्रीराधिका विराजमान हैं। राधामाधव इस पदमें द्वन्द्व समासके द्वारा दोनोंका अभिन्न सम्बन्ध प्रकाशित होता है।