भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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८ श्रीगीतगोविन्दम् इस श्लोकके पूर्वार्द्धमें समुच्चयालङ्कार तथा उत्तरार्द्धमें आशीः अलङ्कार है। फलतः दोनोंकी संसृष्टि है। प्रस्तुत श्लोकमें वैदर्भी रीति, कैशिकी वृत्ति, सम्भाविता गीति, मध्य लय, प्रसाद गुण, अनुकूल नायक तथा स्वाधीनभर्त्तृका नायिका है। इस श्लोकके पूर्वार्द्धमें अभिलाष लक्षण विप्रलम्भ शृङ्गार है तथा शार्दूल-विक्रीड़ित छन्द है॥१॥ वाग्देवताचरितचित्रितचित्तसद्मा पद्मावतीचरणचारणचक्रवर्ती। श्रीवासुदेवरतिकेलिकथासमेतमेतं करोति जयदेवकविः प्रबन्धम्॥२॥ अन्वय—वाग्देवताचरितचित्रितचित्तसद्मा (वाग्देवतायाः सरस्वत्याः चरितेन चित्रितं सुशोभितं चित्तमेव सद्म भवनं यस्य तादृशः; सर्वविद्याविशारद इत्यर्थः; यद्वा वाचां वक्तव्यत्वेन उपस्थितानां तत्केलिमयीनां देवता वक्ता प्रवर्त्तकश्च श्रीकृष्णः तच्चरितेन चित्ररूपेण लिखितं चित्तरूपं सद्म गृहं यस्य सः); [तथा] पद्मावतीचरणचारणचक्रवर्त्ती (पद्मावत्याः लक्ष्म्याः चरणयोः निमित्त भूतयोरेव चारणचक्रवर्त्ती नर्त्तकश्रेष्ठः; श्रियोऽपि प्रियसेवक इत्यर्थः); जयदेवकविः श्रीवासुदेवरतिकेलिकथासमेतं (श्रीवासुदेवस्य वासुनारायणः सचासौ देवश्चेति विग्रहः; श्रीवसुदेवसुतस्य वा रतिकेलिः सुरतोत्सवः तस्य कथा कीर्त्तनं तत्समेतं) एतं प्रबन्धं (ग्रन्थं) करोति॥२॥ अनुवाद—जिनके चित्त-सदनमें समस्त वाणियोंके नियन्ता श्रीकृष्णकी चरितावली सुचारु रूपसे चित्रित हो रही है, जो श्रीराधाजीके चरणयुगल प्राप्तिकी लालसामें निरन्तर नृत्यविधिके अनुसार निमग्न हो रहे हैं, ऐसे महाकवि जयदेव गोस्वामी श्रीकृष्णकी कुञ्ज-विहारादि सुरत लीला समन्वित इस गीतगोविन्द नामके ग्रन्थका प्रणयन कर भावग्राही भक्तजनोंके उज्ज्वल भक्तिरसको उच्छलित कर रहे हैं॥२॥