गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ९ पद्यानुवाद— चारु चरित 'वाणी'के चिन्तित मन-मन्दिरमें जिसके, पद्मावती चरण-चारणसे अङ्ग-अङ्ग सिहरे जिसके। कवि जयदेव रचित है (जिसकी मति-गति अति तल्लीना)— वासुदेव-श्री-केलि-कथामय, यह प्रबन्ध रस-भीना॥२॥ बालबोधिनी—पूर्वश्लोकमें एक पदके द्वारा सूचित श्रीराधामाधवकी लीला स्फूर्तिप्राप्त होनेसे श्रीजयदेवजीका हृदय अतिशय आनन्दसे परिप्लुत हो गया है। उस आनन्दराशिके प्लावनसे प्लावित होकर महान् करुणाके पारावार कवि-चक्रवर्त्ती श्रीजयदेवजी भक्तों पर अनुग्रह प्रकाश करते हुए अपने प्रबन्ध काव्यमें अपनी समर्थता 'वाग्देवता' इति श्लोकके द्वारा अभिव्यक्त करते हुए कह रहे हैं— जयदेवः—जय अर्थात् सर्वोत्कर्षता, देव अर्थात् द्योतयति— प्रकाशयति प्रकाश करते हैं। तात्पर्य यह है कि जो अपनी भक्तिके द्वारा श्रीकृष्णकी लीलाकी सर्वश्रेष्ठता प्रकाशित करते हैं, ऐसे श्रीजयदेवजी। साथ ही यह गीतगोविन्द नामक प्रबन्धकृति प्रकृष्ट रूपसे श्रोताओंके हृदयको आकर्षित करती है अथवा प्रकृष्ट रूपसे कृष्णलीला संसार-बन्धन मुक्त कर भक्तजनोंके हृदयमें उदित होती है। अब प्रश्न होता है कि ग्रन्थमें श्रोताओंके हृदयको आकर्षित करनेकी क्षमता कहाँसे आई? इसके उत्तरमें कहा है कि श्रीवासुदेव रतिकेलि कला समेतम्। यहाँ 'श्री' शब्दसे राधाका तथा वसुदेवके पुत्र रूपमें अवतीर्ण सम्पूर्ण जगत्के स्वामी एवं आत्मास्वरूप भगवान् श्रीकृष्णकी रतिकेलि-कथाका वर्णन है। वासुदेव अर्थात् वसुवंशको प्रकाशित अथवा उज्ज्वल करनेवाले वसुदेव अर्थात् श्रीनन्दमहाराज जो वसुओंमें प्रवर (सर्वश्रेष्ठ) हैं, ऐसे श्रीनन्दजीके पुत्र वासुदेव श्रीकृष्ण हैं। अतः इन दोनोंकी केलि कथाओंसे परिपूर्ण लीलाओंके वर्णनसे श्रीजयदेव कविके हृदयमें ऐसी क्षमता प्रकटित हुई।