भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 448 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 42

१० श्रीगीतगोविन्दम् इस प्रकार यह प्रबन्ध सर्व-चित्ताकर्षक है। इस पदकी व्युत्पत्तिमें श्रीश्च वासुदेवश्च श्रीवासुदेवौ तयो रतिकेलि कथाः ताभिः समेतम्। अब प्रश्न होता है—इस प्रबन्धका वर्णन कैसे हुआ है? इसके उत्तरमें वाणी एवं वक्तव्य रूपमें केलि कलामय देवता, वक्ता एवं प्रवर्त्तक स्वयं श्रीकृष्ण जिनकी चित्तरूपी कन्दरामें सदा अवस्थित हैं, जिनकी इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ देवता श्रीकृष्ण उनमें शक्तिका सञ्चार करते हैं, ऐसे श्रीजयदेवजी अपने इष्टदेवको वाग्देवताके रूपमें निरूपित कर रहे हैं। अतएव इस काव्यकी रचनामें श्रीकृष्णका ही कर्त्तृत्व है। श्रीजयदेवके चित्त-सद्ममें समस्त लीलाएँ चित्रपटकी भाँति संग्रथित हैं। चित्रकारके हृदयमें जो स्फूर्ति होती है और चित्रफलकमें जो उदित होता है वही चित्ररूपमें बन जाता है, उसी प्रकार यह केलिचित्रण श्रीजयदेवजीकी लेखनी पर अधिष्ठित होकर अंकित हुआ है। कविका चित्तरूपी सद्म विलक्षण है तथा विचित्र कवितारूपी महाधनका भण्डार है और श्रीराधामाधवके केलि-चरित्रोंसे चित्रित है। कविकी वाणी और मन भी माधव परायण है। अतः निज कर्त्तृत्वका उनके द्वारा परित्याग कर दिया गया है। अब पुनः प्रश्न होता है कि यह सब होनेपर भी ऐसी चित्रण-शक्ति कहाँसे आई? इसके उत्तरमें कहते हैं—श्री जयदेवजीकी कायिकी-वृत्ति श्रीराधापरायणा अर्थात् श्रीराधाजीकी प्रेरणा ही उनकी इन्द्रिय शक्ति है। श्रीराधा किस प्रकार उनमें अवस्थित हैं? उत्तरमें—श्रीराधाजी पद्मावती हैं। पद्मं करे अस्ति यस्याः सा—यह पद्मावती शब्दकी व्युत्पत्ति है अर्थात् जिसके हाथमें कमल विद्यमान है, वे श्रीराधाजी ही पद्मावती हैं। इन श्रीराधाजीके चरणकमलोंकी प्राप्तिकी लालसासे चारण चक्रवर्त्ती—नर्त्तक-श्रेष्ठ नट-सार्वभौम श्रीजयदेवजी अपनी