गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः सर्गः—सामोद–दामोदरः ११ वाणीरूपी नृत्य-कलाके द्वारा सदा उनकी आराधनामें तत्पर हैं। इस प्रसङ्गसे यह भाव भी व्यक्त हो रहा है कि कविराजजी प्रधान रूपसे श्रीराधाजीके उपासना-परायण हैं। एक और भी गूढ़ रहस्य है कि महाकवि श्रीजयदेवजीकी पत्नीका नाम भी पद्मावती है। वे श्रीराधामाधव युगलकी उच्चकोटिकी प्रेममयी आराधिका हैं। उन श्रीपद्मावतीजीके प्रति भी महाकवि अपनी कृतज्ञता प्रकाश कर रहे हैं। प्रस्तुत श्लोकमें चित्त तथा सद्मका अभेद रूप होनेसे रूपकालङ्कार है तथा अनुज्ञालङ्कार भी। वसन्ततिलका छन्द, ओज गुण, गौड़ीया रीति, भारती वृत्ति तथा संभाविता गीति है॥२॥ यदि हरिस्मरणे सरसं मनो यदि विलासकलासु कुतूहलम्। मधुरकोमलकान्तपदावलीं शृणु तदा जयदेवसरस्वतीम्॥३॥ अन्वय—यदि हरिस्मरणे (श्रीकृष्णचिन्तने) मनः सरसं (रसवत्, स्निग्धमिति यावत्) [कर्त्तुमिच्छेः]; [तथा] यदि विलासकलासु [गतिस्थानासनादीनां मुखनेत्रादिकर्मणाम्। तात्कालि- कन्त्तु वैशिष्ट्यं विलासः प्रियसङ्गजम्॥ इत्युज्ज्वलनीलमणिः। तात्कालिकं दयितालोकनादिभवम्।] (श्रीकृष्णरतिप्रसङ्गेषु रास- कुञ्जादिलीलायाः कलासु वैदग्धीचारुचेष्टासु इत्यर्थः) कुतूहलं (कौतुकं) [स्यात्], तदा (तर्हि) मधुरकोमलकान्तपदावलीं (शृङ्गाररसप्राधान्यात् मधुरा माधुर्यगुणयुक्ताः कोमलाः सरसाः तथा गेयत्वात् कान्ताः मनोज्ञाः पदानाम् आवल्यः पङ्क्तयः यस्यां तादृशीं) जयदेव-सरस्वतीं (जयदेववाणीं तत्कृतप्रबन्धमिति यावत्) शृणु॥३॥