गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—हे श्रोताओं ! यदि श्रीहरिके चरित्रका चिन्तन करते हुए आपलोगोंका मन सरस अनुरागमय होता है तथा उनकी रास-विहारादि विलास-कलाओंकी सुचारु चातुर्यमयी चेष्टाके विषयमें आपके हृदयमें कुतूहल होता है तो मनोहर सुमधुर मृदुल तथा कमनीय कान्तिगुणवाले पदसमूह युक्त कवि जयदेवकी इस गीतावलीको भक्ति-भावसे श्रवणकर आनन्दमें निमग्न हो जाएँ। पद्यानुवाद— यदि हरि-चिन्तन-रस आतुर मन, यदि रति-भाव हुलासे। तो मधु कोमलकान्त पदावलि, सुनो, स्वर्ग-सुख भासे ॥३॥ बालबोधिनी—इस प्रबन्ध-काव्यकी रचना करनेमें अपनी योग्यता प्राप्त करते हुए सिद्ध अर्थात् प्रतिज्ञात अर्थके लिए कविके मनमें कोई खेद या विषाद नहीं रहा है। कदाचित् मन्दबुद्धि परायण व्यक्ति इसमें श्रद्धा न रखे, इसलिए इस महाकाव्यके अनुशीलनमें अधिकारीका निश्चय किया गया है। हे भक्तगण ! यदि श्रीकृष्णके निरन्तर स्मरणसे मन स्निग्ध हो जाता है तथा उनकी रास-विहार कुञ्ज-विलास (स्त्रियोंके हाव-भाव विशेषका नाम विलास है, गमनादिकी क्रियाओंको भी विलास कहा जाता है), लीला-चातुरी, विदग्ध-माधुरी आदि चारु-चेष्टाओंके विषयमें मनमें कौतूहल परायणता होती हो तो शृङ्गार रसके वर्णन करनेवाले कवि जयदेवजीकी इस मधुर वाणीका श्रवण करें। वस्तुतः किसीको सामान्य हरिःस्मरणसे और किसीको श्रीहरिकी विशिष्ट रासादि लीलाके अवलोकनसे परानन्दकी अनुभूति होती है। अब यह काव्य कैसा है? इसके उत्तरमें कहते हैं—यह काव्य शृङ्गार-रस प्रधान और अति मधुर है। इसका अर्थ सहज और बोधगम्य है। इस काव्यके पद अतिशय माधुर्य गुणोपेत-कोमल वर्णनोंसे ग्रथित तथा रमणीय