गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः सर्गः—सामोद–दामोदरः १३ हैं; क्योंकि वे राधाकृष्णकी कान्ति नामक गुणसे युक्त हैं, जैसे—कान्ता कान्तकी अतिशय प्रिया होती है, वैसे ही यह कमनीय पदावली भक्तजनोंको अतिशय प्रिय है। इससे इसको सङ्गीतात्मकता तथा गेयता प्राप्त है। इसे मधुर कण्ठसे गाया जाना चाहिए। प्राचीन अलङ्कारशास्त्रियोंने माधुर्य नामक गुणको दो प्रकारका बतलाया है— शब्दाश्रित और अर्थाश्रित। वाक्यगत पृथक्पदत्वको शब्दाश्रित माधुर्य कहते हैं तथा उक्तिकी विचित्रताको अर्थगत माधुर्य कहते हैं। ये दोनों प्रकारके माधुर्य इस काव्यमें दृष्टिगोचर होते हैं। शब्द और अर्थगत कोमलता भी इस काव्यमें पायी जाती है। इन पद्योंमें अभिधेय, प्रयोजन तथा अधिकारीका निरूपण हुआ है। श्रीराधामाधवकी रहःकेलि अभिधेय है, प्रतिपाद्य श्रीराधामाधव हैं और प्रतिपादक ग्रन्थ है। यह स्मार्य–स्मारक सम्बन्ध है। श्रीराधामाधवकी केलि–लीलाका श्रवण कीर्त्तन करते हुए अनुमोदनजनित आनन्दका अनुभव और इसमें विभावित अन्तःकरणवाले वैष्णव ही इसके अधिकारी हैं। इस पद्यमें दीपकालङ्कार, पाञ्चाली रीति, कैशिकी वृत्ति तथा द्रुतविलम्बित छन्द है। वाचः पल्लवयत्युमापतिधरः सन्दर्भशुद्धिं गिरां, जानीते जयदेवएव शरणः श्लाघ्यो दुरूह–द्रुते। शृङ्गारोत्तर–सत्प्रमेय– रचनैराचार्य–गोवर्द्धन– स्पर्द्धी कोऽपि न विश्रुतः श्रुतिधरो धोयी कवि–क्ष्मापतिः ॥४॥ अन्वय—उमापतिधरः (तन्नामा कविः) वाचः (वाक्यानि) पल्लवयति, (विस्तारयति; सन्दर्भे वागाडम्बरं प्रदर्शयति, न तु काव्यगुणयुक्ताः करोति) शरणः (तन्नामा कविः) दुरूहद्रुते