गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ श्रीगीतगोविन्दम् (दुरूहस्य दुर्बोधस्य सन्दर्भस्य द्रुते शीघ्रवचने) श्लाघ्यः (प्रशंसनीयः) [नतु प्रसादादिगुणयुक्ते]; शृङ्गारोत्तरसत्प्रमेयरचनैः (शृङ्गारोत्तराणि शृङ्गार-रसप्रधानानि सन्ति उत्कृष्टानि यानि प्रमेयाणि प्रबन्धाः तेषां रचनैः) कोऽपि [कविः] आचार्य-गोवर्द्धन-स्पर्द्धी तेन तुल्यः) न विश्रुतः (न ज्ञातः) [नतु रसान्तर-वर्णने]; [तथा] कवि-क्ष्मापतिः (कविराजः) धोयी (तन्नामा कविः) श्रुतिधरः (श्रुत्या श्रवणमात्रेणैव अभ्यासकर्त्ता इत्यर्थः) नतु [स्वयं कवितारचनायाम्]; [परन्तु] जयदेव एव [नत्वन्यः कोऽपि कविः] गिरां (वाचां) सन्दर्भशुद्धिं (विशुद्धग्रन्थनं) जानीते [अथवा दैन्योक्तिरियम्-गिरां सन्दर्भशुद्धिं किं जयदेव एव जानीते? न जानीते एव; यत्र उमापतिधरो वाचः पल्लवयतीत्यादि ॥४॥ अनुवाद-उमापति धर नामक कोई विख्यात कवि अपनी वाणीको अनुप्रासादि अलङ्कारके द्वारा सुसज्जित करते हैं। शरण नामके कवि अत्यन्त क्लिष्ट पदोंमें कविताका विन्यासकर प्रशंसाके पात्र हुए हैं। सामान्य नायक-नायिकाके वर्णनमें केवल शृङ्गार रसका उत्कर्ष वर्णन करनेमें गोवर्द्धनके समान दूसरा कोई कवि श्रुतिगोचर नहीं हुआ है। कविराज धोयी तो श्रुतिधर हैं। वे जो कुछ भी सुनते हैं, कण्ठस्थ कर लेते हैं। जब ऐसे-ऐसे महान् कवि सर्वगुणसम्पन्न नहीं हो सके, फिर जयदेव कविका काव्य किसप्रकार सर्वगुणसम्पन्न हो सकता है? बालबोधिनी-कवि जयदेवजीने अति दैन्य-विनय वचनोंके द्वारा स्वयंको पद्मावती श्रीराधारानीके चरणकमलोंका चारण चक्रवर्त्ती कहकर अपना परिचय दिया है, उसी आवेशमें अन्य कवियोंकी कृतियोंमें प्राकृत भाव अथवा हेयताकी उपलब्धि कर अपने काव्यमें प्रौढ़ता अर्थात् गाम्भीर्यका विस्तार करते हुए कहते हैं-महाराज लक्ष्मणसेनकी सभामें छह प्रख्यात विद्वान थे। (१) उमापतिधर नामक कवि राजा