गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः १५ लक्ष्मणसेनके अमात्य थे, वे केवल अपनी वाणीका विस्तार मात्र करना जानते थे, उनके काव्यमें वाङ्माधुर्य तथा शब्दार्थ गुणोंका अभाव होता था। उन्होंने वाणीको शाखा-प्रशाखाओंमें पल्लवित तो किया, परन्तु ग्राह्य नहीं बना पाये थे, फलतः उनका काव्य सहृदय स्वरूपा ह्लादक अर्थात् आनन्ददायिनी न होकर केवल चित्रकोटिके काव्यमें सन्निविष्ट होता था। (२) शरण नामके कवि दुरूह तथा शीघ्रतापूर्वक कविताका प्रणयन करनेके लिए प्रख्यात थे। वे लोकप्रिय तो हुए, परन्तु उनका भी काव्य गूढार्थत्वादि दोषोंसे युक्त एवं प्रसादादि गुणोंसे रहित होता था। (३) गोवर्द्धनाचार्य लक्ष्मणसेनकी सभाके तीसरे पण्डित थे। शृङ्गार-रस जो क्रमशः अन्यान्य रसोंसे श्रेष्ठ है—ऐसे उसके आलम्बन स्वरूप साधारण नायक-नायिकाके वर्णन करनेमें आचार्य गोवर्द्धनका कोई प्रतिस्पर्धी नहीं हुआ। परन्तु वे रसान्तर अर्थात् दूसरे-दूसरे रसोंका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हो सके। उनके काव्यमें निर्दोष अर्थका सन्निवेश होता था। (४) श्रुतिधर नामक कवि तो अपने गुणोंके कारण ही प्रसिद्ध थे। वे केवल एकबार सुनकर ही काव्यको याद कर लेते थे। (५) धोयी कवि अपनी कविराजकी प्रथासे प्रसिद्ध थे। ग्रन्थके अधिकारी बन तो जाते थे, परन्तु स्वयं कविताका निर्माण नहीं कर पाते थे। (६) लक्ष्मणसेनकी सभाके छठे कवि जयदेव थे। वाणीकी शुद्धि केवल भगवान्के नाम, रूप, गुण एवं लीला आदिके वर्णनसे होती है। इस वाणी-शोधनकी प्रथा एकमात्र कवि जयदेव ही जानते हैं। श्रीमद्भागवतमें श्रीनारदजी कह रहे हैं—“तद्वाग् विसर्गो जनताघविप्लवो”। अथवा कविने स्वयं दैन्य प्रकट किया है, तदनुसार इस श्लोकका भावार्थ होगा कि क्या वाणीकी शुद्धि कवि जयदेव जानते हैं? नहीं, वे नहीं जानते।