गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ श्रीगीतगोविन्दम् उमापति वाणीका विस्तारकर सकते हैं, शरण कवि दुरूह वाक्योंको शीघ्र रचित करनेके लिए प्रसिद्ध हैं, आचार्य गोवर्द्धनके समान कोई कवि हुआ ही नहीं, धोयी कविराज हैं, श्रुतिधर तो श्रुतिधर ही हैं, परन्तु जयदेव कवि कुछ नहीं जानते। रसमञ्जरीकार लक्ष्मणसेनकी सभाके पाँच कवियोंको ही स्वीकार करते हैं और वे 'श्रुतिधरः' पदको कवि-विशेषकी संज्ञा न मानकर उसे धोयी कविका ही विशेषण मानते हैं। इस विषयमें उनका कहना है कि धोयी कवि तो किसी काव्यको एक बार सुनने मात्रसे ही उसे कण्ठस्थ कर लेते हैं। वाणीकी अधिष्ठात्री देवी सरस्वतीजीने प्रमाणित किया है कि पूर्वोक्त भावार्थ ही ठीक है। भगवान्की लीलाओंके वर्णनके कारण यह रचना समस्त प्रकारके काव्योंमें श्रेष्ठ है। यह गीति-काव्य अति महत्वपूर्ण, सरस, गोपनीय एवं मधुर है। इस श्लोकमें शार्दूल विक्रीड़ित छन्द तथा समुच्चयालङ्कार है ॥४॥ अथ प्रथमः सन्दर्भः। अष्टपदी गीतम् ॥१॥ मालवगौड़रागेण रूपकतालेन च गीयते ॥प्रबन्धः ॥१॥ प्रलयपयोधिजले धृतवानसि वेदं विहितवहित्रचरित्रमखेदम् । केशव धृत-मीनशरीर जय जगदीश हरे ॥ध्रुवपदम् ॥१॥