गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
१२ श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—हे श्रोताओं ! यदि श्रीहरिके चरित्रका चिन्तन करते हुए आपलोगोंका मन सरस अनुरागमय होता है तथा उनकी रास-विहारादि विलास-कलाओंकी सुचारु चातुर्यमयी चेष्टाके विषयमें आपके हृदयमें कुतूहल होता है तो मनोहर सुमधुर मृदुल तथा कमनीय कान्तिगुणवाले पदसमूह युक्त कवि जयदेवकी इस गीतावलीको भक्ति-भावसे श्रवणकर आनन्दमें निमग्न हो जाएँ। पद्यानुवाद— यदि हरि-चिन्तन-रस आतुर मन, यदि रति-भाव हुलासे। तो मधु कोमलकान्त पदावलि, सुनो, स्वर्ग-सुख भासे ॥३॥ बालबोधिनी—इस प्रबन्ध-काव्यकी रचना करनेमें अपनी योग्यता प्राप्त करते हुए सिद्ध अर्थात् प्रतिज्ञात अर्थके लिए कविके मनमें कोई खेद या विषाद नहीं रहा है। कदाचित् मन्दबुद्धि परायण व्यक्ति इसमें श्रद्धा न रखे, इसलिए इस महाकाव्यके अनुशीलनमें अधिकारीका निश्चय किया गया है। हे भक्तगण ! यदि श्रीकृष्णके निरन्तर स्मरणसे मन स्निग्ध हो जाता है तथा उनकी रास-विहार कुञ्ज-विलास (स्त्रियोंके हाव-भाव विशेषका नाम विलास है, गमनादिकी क्रियाओंको भी विलास कहा जाता है), लीला-चातुरी, विदग्ध-माधुरी आदि चारु-चेष्टाओंके विषयमें मनमें कौतूहल परायणता होती हो तो शृङ्गार रसके वर्णन करनेवाले कवि जयदेवजीकी इस मधुर वाणीका श्रवण करें। वस्तुतः किसीको सामान्य हरिःस्मरणसे और किसीको श्रीहरिकी विशिष्ट रासादि लीलाके अवलोकनसे परानन्दकी अनुभूति होती है। अब यह काव्य कैसा है? इसके उत्तरमें कहते हैं—यह काव्य शृङ्गार-रस प्रधान और अति मधुर है। इसका अर्थ सहज और बोधगम्य है। इस काव्यके पद अतिशय माधुर्य गुणोपेत-कोमल वर्णनोंसे ग्रथित तथा रमणीय
प्रथमः सर्गः—सामोद–दामोदरः १३ हैं; क्योंकि वे राधाकृष्णकी कान्ति नामक गुणसे युक्त हैं, जैसे—कान्ता कान्तकी अतिशय प्रिया होती है, वैसे ही यह कमनीय पदावली भक्तजनोंको अतिशय प्रिय है। इससे इसको सङ्गीतात्मकता तथा गेयता प्राप्त है। इसे मधुर कण्ठसे गाया जाना चाहिए। प्राचीन अलङ्कारशास्त्रियोंने माधुर्य नामक गुणको दो प्रकारका बतलाया है— शब्दाश्रित और अर्थाश्रित। वाक्यगत पृथक्पदत्वको शब्दाश्रित माधुर्य कहते हैं तथा उक्तिकी विचित्रताको अर्थगत माधुर्य कहते हैं। ये दोनों प्रकारके माधुर्य इस काव्यमें दृष्टिगोचर होते हैं। शब्द और अर्थगत कोमलता भी इस काव्यमें पायी जाती है। इन पद्योंमें अभिधेय, प्रयोजन तथा अधिकारीका निरूपण हुआ है। श्रीराधामाधवकी रहःकेलि अभिधेय है, प्रतिपाद्य श्रीराधामाधव हैं और प्रतिपादक ग्रन्थ है। यह स्मार्य–स्मारक सम्बन्ध है। श्रीराधामाधवकी केलि–लीलाका श्रवण कीर्त्तन करते हुए अनुमोदनजनित आनन्दका अनुभव और इसमें विभावित अन्तःकरणवाले वैष्णव ही इसके अधिकारी हैं। इस पद्यमें दीपकालङ्कार, पाञ्चाली रीति, कैशिकी वृत्ति तथा द्रुतविलम्बित छन्द है। वाचः पल्लवयत्युमापतिधरः सन्दर्भशुद्धिं गिरां, जानीते जयदेवएव शरणः श्लाघ्यो दुरूह–द्रुते। शृङ्गारोत्तर–सत्प्रमेय– रचनैराचार्य–गोवर्द्धन– स्पर्द्धी कोऽपि न विश्रुतः श्रुतिधरो धोयी कवि–क्ष्मापतिः ॥४॥ अन्वय—उमापतिधरः (तन्नामा कविः) वाचः (वाक्यानि) पल्लवयति, (विस्तारयति; सन्दर्भे वागाडम्बरं प्रदर्शयति, न तु काव्यगुणयुक्ताः करोति) शरणः (तन्नामा कविः) दुरूहद्रुते
१४ श्रीगीतगोविन्दम् (दुरूहस्य दुर्बोधस्य सन्दर्भस्य द्रुते शीघ्रवचने) श्लाघ्यः (प्रशंसनीयः) [नतु प्रसादादिगुणयुक्ते]; शृङ्गारोत्तरसत्प्रमेयरचनैः (शृङ्गारोत्तराणि शृङ्गार-रसप्रधानानि सन्ति उत्कृष्टानि यानि प्रमेयाणि प्रबन्धाः तेषां रचनैः) कोऽपि [कविः] आचार्य-गोवर्द्धन-स्पर्द्धी तेन तुल्यः) न विश्रुतः (न ज्ञातः) [नतु रसान्तर-वर्णने]; [तथा] कवि-क्ष्मापतिः (कविराजः) धोयी (तन्नामा कविः) श्रुतिधरः (श्रुत्या श्रवणमात्रेणैव अभ्यासकर्त्ता इत्यर्थः) नतु [स्वयं कवितारचनायाम्]; [परन्तु] जयदेव एव [नत्वन्यः कोऽपि कविः] गिरां (वाचां) सन्दर्भशुद्धिं (विशुद्धग्रन्थनं) जानीते [अथवा दैन्योक्तिरियम्-गिरां सन्दर्भशुद्धिं किं जयदेव एव जानीते? न जानीते एव; यत्र उमापतिधरो वाचः पल्लवयतीत्यादि ॥४॥ अनुवाद-उमापति धर नामक कोई विख्यात कवि अपनी वाणीको अनुप्रासादि अलङ्कारके द्वारा सुसज्जित करते हैं। शरण नामके कवि अत्यन्त क्लिष्ट पदोंमें कविताका विन्यासकर प्रशंसाके पात्र हुए हैं। सामान्य नायक-नायिकाके वर्णनमें केवल शृङ्गार रसका उत्कर्ष वर्णन करनेमें गोवर्द्धनके समान दूसरा कोई कवि श्रुतिगोचर नहीं हुआ है। कविराज धोयी तो श्रुतिधर हैं। वे जो कुछ भी सुनते हैं, कण्ठस्थ कर लेते हैं। जब ऐसे-ऐसे महान् कवि सर्वगुणसम्पन्न नहीं हो सके, फिर जयदेव कविका काव्य किसप्रकार सर्वगुणसम्पन्न हो सकता है? बालबोधिनी-कवि जयदेवजीने अति दैन्य-विनय वचनोंके द्वारा स्वयंको पद्मावती श्रीराधारानीके चरणकमलोंका चारण चक्रवर्त्ती कहकर अपना परिचय दिया है, उसी आवेशमें अन्य कवियोंकी कृतियोंमें प्राकृत भाव अथवा हेयताकी उपलब्धि कर अपने काव्यमें प्रौढ़ता अर्थात् गाम्भीर्यका विस्तार करते हुए कहते हैं-महाराज लक्ष्मणसेनकी सभामें छह प्रख्यात विद्वान थे। (१) उमापतिधर नामक कवि राजा
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः १५ लक्ष्मणसेनके अमात्य थे, वे केवल अपनी वाणीका विस्तार मात्र करना जानते थे, उनके काव्यमें वाङ्माधुर्य तथा शब्दार्थ गुणोंका अभाव होता था। उन्होंने वाणीको शाखा-प्रशाखाओंमें पल्लवित तो किया, परन्तु ग्राह्य नहीं बना पाये थे, फलतः उनका काव्य सहृदय स्वरूपा ह्लादक अर्थात् आनन्ददायिनी न होकर केवल चित्रकोटिके काव्यमें सन्निविष्ट होता था। (२) शरण नामके कवि दुरूह तथा शीघ्रतापूर्वक कविताका प्रणयन करनेके लिए प्रख्यात थे। वे लोकप्रिय तो हुए, परन्तु उनका भी काव्य गूढार्थत्वादि दोषोंसे युक्त एवं प्रसादादि गुणोंसे रहित होता था। (३) गोवर्द्धनाचार्य लक्ष्मणसेनकी सभाके तीसरे पण्डित थे। शृङ्गार-रस जो क्रमशः अन्यान्य रसोंसे श्रेष्ठ है—ऐसे उसके आलम्बन स्वरूप साधारण नायक-नायिकाके वर्णन करनेमें आचार्य गोवर्द्धनका कोई प्रतिस्पर्धी नहीं हुआ। परन्तु वे रसान्तर अर्थात् दूसरे-दूसरे रसोंका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हो सके। उनके काव्यमें निर्दोष अर्थका सन्निवेश होता था। (४) श्रुतिधर नामक कवि तो अपने गुणोंके कारण ही प्रसिद्ध थे। वे केवल एकबार सुनकर ही काव्यको याद कर लेते थे। (५) धोयी कवि अपनी कविराजकी प्रथासे प्रसिद्ध थे। ग्रन्थके अधिकारी बन तो जाते थे, परन्तु स्वयं कविताका निर्माण नहीं कर पाते थे। (६) लक्ष्मणसेनकी सभाके छठे कवि जयदेव थे। वाणीकी शुद्धि केवल भगवान्के नाम, रूप, गुण एवं लीला आदिके वर्णनसे होती है। इस वाणी-शोधनकी प्रथा एकमात्र कवि जयदेव ही जानते हैं। श्रीमद्भागवतमें श्रीनारदजी कह रहे हैं—“तद्वाग् विसर्गो जनताघविप्लवो”। अथवा कविने स्वयं दैन्य प्रकट किया है, तदनुसार इस श्लोकका भावार्थ होगा कि क्या वाणीकी शुद्धि कवि जयदेव जानते हैं? नहीं, वे नहीं जानते।
१६ श्रीगीतगोविन्दम् उमापति वाणीका विस्तारकर सकते हैं, शरण कवि दुरूह वाक्योंको शीघ्र रचित करनेके लिए प्रसिद्ध हैं, आचार्य गोवर्द्धनके समान कोई कवि हुआ ही नहीं, धोयी कविराज हैं, श्रुतिधर तो श्रुतिधर ही हैं, परन्तु जयदेव कवि कुछ नहीं जानते। रसमञ्जरीकार लक्ष्मणसेनकी सभाके पाँच कवियोंको ही स्वीकार करते हैं और वे 'श्रुतिधरः' पदको कवि-विशेषकी संज्ञा न मानकर उसे धोयी कविका ही विशेषण मानते हैं। इस विषयमें उनका कहना है कि धोयी कवि तो किसी काव्यको एक बार सुनने मात्रसे ही उसे कण्ठस्थ कर लेते हैं। वाणीकी अधिष्ठात्री देवी सरस्वतीजीने प्रमाणित किया है कि पूर्वोक्त भावार्थ ही ठीक है। भगवान्की लीलाओंके वर्णनके कारण यह रचना समस्त प्रकारके काव्योंमें श्रेष्ठ है। यह गीति-काव्य अति महत्वपूर्ण, सरस, गोपनीय एवं मधुर है। इस श्लोकमें शार्दूल विक्रीड़ित छन्द तथा समुच्चयालङ्कार है ॥४॥ अथ प्रथमः सन्दर्भः। अष्टपदी गीतम् ॥१॥ मालवगौड़रागेण रूपकतालेन च गीयते ॥प्रबन्धः ॥१॥ प्रलयपयोधिजले धृतवानसि वेदं विहितवहित्रचरित्रमखेदम् । केशव धृत-मीनशरीर जय जगदीश हरे ॥ध्रुवपदम् ॥१॥
प्रथमः सर्गः—सामोद–दामोदरः १७ क्षितिरतिविपुलतरे तिष्ठति तव पृष्ठे धरणि–धरणकिण–चक्रगरिष्ठे । केशव धृत–कूर्मशरीर जय जगदीश हरे ॥२ ॥ वसति दशनशिखरे धरणी तव लग्ना शशिनि कलङ्ककलेव निमग्ना। केशव धृत–शूकररूप जय जगदीश हरे ॥३ ॥ तव करकमलवरे नखमद्भुतशृङ्गम् दलितहिरण्यकशिपु–तनुभृङ्गम्। केशव धृत–नरहरिरूप जय जगदीश हरे ॥४ ॥ छलयसि विक्रमणे बलिमद्भुतवामन पद–नख–नीर–जनितजनपावन। केशव धृत–वामनरूप जय जगदीश हरे ॥५ ॥ क्षत्रिय–रुधिरमये जगदपगत–पापम् स्नपयसि पयसि शमित–भवतापम्। केशव धृत–भृगुपतिरूप जय जगदीश हरे ॥६ ॥ वितरसि दिक्षु रणे दिक्पति–कमनीयं दशमुख–मौलि–बलिं रमणीयम्। केशव धृत–रामशरीर जय जगदीश हरे ॥७ ॥ वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभम् हलहति–भीति–मिलित–यमुनाभम्। केशव धृत–हलधररूप जय जगदीश हरे ॥८ ॥
१८ श्रीगीतगोविन्दम् निन्दसि यज्ञ-विधेरहह श्रुतिजातम् सदय-हृदय दर्शितपशुघातम्। केशव धृत-बुद्धशरीर जय जगदीश हरे ॥९॥ म्लेच्छ-निवहनिधने कलयसि करवालं धूमकेतुमिव किमपि करालम्। केशव धृत-कल्किशरीर जय जगदीश हरे ॥१०॥ श्रीजयदेवकवेरिदमुदितमुदारम् शृणु सुखदं शुभदं भवसारम्। केशव धृत-दशविधरूप जय जगदीश हरे ॥११॥ वेदानुद्धरते जगन्ति वहते भूगोलमुद्बिभ्रते दैत्यं दारयते बलिं छलयते क्षत्रक्षयं कुर्वते। पौलस्तं जयते हलं कलयते कारुण्यमातन्वते म्लेच्छान् मूर्च्छयते दशाकृतिकृते कृष्णाय तुभ्यं नमः ॥१२॥ प्रलयपयोधिजले धृतवानसि वेदं विहितवहित्रचरित्रमखेदम् । केशव धृत-मीनशरीर जय जगदीश हरे ॥ध्रुवपदम् ॥१॥ अन्वय—हे केशव ! हे धृत-मीनशरीर ! (स्वीकृत-मत्स्य- कलेवर) त्वं प्रलयपयोधिजले (कल्पान्तसागर-सलिले) विहित- वहित्रचरित्रम् (विहितं स्वीकृतम् अवलम्बितमिति यावत् वहित्रस्य अर्णवपोतस्य चरित्रं व्यवहारो यस्मिन् तद्यथा स्यात् तथा) अखेदं (अनायासं यथा स्यात् तथा) वेदं धृतवानसि (रक्षितवानसि) [अतः] हे जगदीश, हे हरे, (हरति भक्तानामशेषक्लेशमिति हरिः तत्सम्बुद्धौ) त्वं जय (सर्वोत्कर्षे वर्त्तस्व) ॥१॥
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः १९ अनुवाद—हे जगदीश्वर ! हे हरे ! नौका (जलयान) जैसे बिना किसी खेदके सहर्ष सलिलस्थित किसी वस्तुका उद्धार करती है, वैसे ही आपने बिना किसी परिश्रमके निर्मल चरित्रके समान प्रलय जलधिमें मत्स्यरूपमें अवतीर्ण होकर वेदोंको धारणकर उनका उद्धार किया है। हे मत्स्यावतारधारी श्रीभगवान् ! आपकी जय हो। पद्यानुवाद— जय जगदीश हरे! प्रलय-जलधिसे नौ सम न्यारे वेद उबारे, हास्य-सँवारे। केशव मत्स्य स्वरूप लसे, जय जगदीश हरे ॥१॥ बालबोधिनी—श्रीराधामाधवकी लीलामाधुरीकी सर्वोत्कर्षताका वर्णन करना ही कवि जयदेवको अभिप्रेत है। वे ग्रन्थके आरम्भमें ‘प्रलयपयोधिजले’ श्लोकसे लेकर इस अष्टपदीके अन्ततक समस्त अवतारोंके मूल आश्रय-स्वरूप अखिल नायक शिरोमणि श्रीकृष्णके मत्स्यादि अवतारोंका वर्णन कर रहे हैं। यह अष्टपदी मालव गौड़ रागमें तथा रूपक तालसे गायी जाती है। मालवगौड़ रागका स्वरूप इस प्रकार है— नितम्बिनीचुम्बितवक्त्रपद्मः, शुकद्युतिः कुण्डलवान् प्रमत्तः। सङ्गीतशालां प्रविशन् प्रदोषे, मालाधरो मालवरागराजः ॥ नितम्बिनी नायिकाके द्वारा चुम्बित मुखकमलवाला, शुकके समान हरित-वर्णकी कान्तिवाला, कानोंमें कुण्डल तथा गलेमें माला पहने हुए, मदमत्त, रागोंका राजा मालव सङ्गीतशालामें प्रवेश करता है। इस अष्टपदीका ताल रूपक है। जैसे—अन्तमें विराम और द्रुत दोनोंके मिलनमें विलक्षणा रूपक ताल होता है। इस अष्टपदीमें श्रीभगवान्के लिए चार सम्बोधन हैं। पहला सम्बोधन है 'केशव'। भगवान्को कई कारणोंसे 'केशव' कहा जाता है—
२० श्रीगीतगोविन्दम् (१) वराहावतारमें भगवान्के जो बाल गिरे, वे कुश रूपमें अङ्कुरित हुए। वेद-विहित यज्ञादि क्रियाकलापोंमें कुशकी आवश्यकता होती है। बिना कुशके वे कार्यकलाप सम्पन्न नहीं होते। इसलिए भगवान् केशव कहलाये। (२) 'केशाद्वोऽन्यतरस्याम'- इस पाणिनीय सूत्रके अनुसार केश शब्दसे प्रसिद्ध अर्थमें 'व' प्रत्यय होकर केशव शब्द बनता है। (३) श्रीभगवान्के द्वादश व्यूहोंमें 'केशव-व्यूह'का सर्वप्रथम स्थान है। (४) इस 'केशव' नामकी व्याख्या करते हुए भगवद्गुण दर्पणकार कहते हैं- 'प्रशस्तस्निग्धनीलकुटिलकुन्तलः' अर्थात् 'केशव' - यह भगवान्का नाम उन भगवान्के प्रशस्त काले और घुँघराले बालोंवाला बतलाता है। (५) 'केशवः- को ब्रह्मा ईशश्च तावपि वयते प्रशस्तीति' अर्थात् क-ब्रह्मा, ईश-महादेव दोनोंके नियामक या शासकको केशव कहते हैं। (६) 'केशान् वयते' गोपियोंके केश-संस्कार करनेवाले रसिकशेखर श्रीकृष्ण ही 'केशव' कहलाते हैं। (७) केशी नामक दैत्यका संहार करनेवाले केशव हैं। 'धृतमीनशरीर'- यह भगवान्का दूसरा सम्बोधन है। श्रीभगवान् सन्तजनोंके परित्राण और पापियोंके विनाश हेतु विविध रूपोंमें अवतरित होते हैं। उनके असंख्य अवतारोंमेंसे दश प्रधान हैं। उन दश अवतारोंमें मत्स्यावतार सर्वप्रथम अवतार है। इस अवतारमें श्रीभगवान्ने वेदोंके अपहरणकर्त्ता हयग्रीवका वधकर वेदोंका उद्धार किया था। ये मीन अवतार वीभत्स रसके अधिष्ठाता हैं। 'जगदीश'- इस तीसरे सम्बोधनका अभिप्राय यह है कि श्रीभगवान् सम्पूर्ण जगत् और प्रकृतिके ईश्वर हैं। वे सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि, स्थिति एवं पालनका नियमन करते हैं तथा जगत्के भीतर अन्तर्यामी रूपमें स्थित होकर उसका नियमन करते हैं। जगदीश शब्दसे भगवान्की करुणा भी प्रकट होती है।
प्रथमः सर्गः—सामोद–दामोदरः २१ 'हरे'—इस चतुर्थ सम्बोधनका तात्पर्य यह है कि भगवान् भक्तोंके अशेष प्रकारके कष्टोंको हरण करनेवाले हैं—हरति भक्तानां क्लेशम्। इसी हेतु उनका अवतार होता है। इन चार सम्बोधनोंके द्वारा कविराजने श्रीभगवान्के प्रति अतिशय आदर प्रदर्शित किया है। जय, अर्थात् हे प्रभो ! आप अपने उत्कर्षका आविष्कार करनेमें सिद्धहस्त हैं, आप इस उत्कर्षको प्रकट करें। जय जगदीश हरे—यह पंक्ति प्रत्येक पदके साथ आवृत्त करके गायी गई है, अतएव इसे ध्रुव–पद कहा जाता है—'ध्रुवत्वाच्च ध्रुवो ज्ञेयः'। यह ध्रुव–पद अन्तमें प्रयुक्त होता है। इस अष्टपदीमें भगवान् श्रीकेशवके मत्स्यावतारके चरित्रका वर्णन किया गया है। इस प्रथम अवतारमें श्रीकृष्णने प्रलयकालीन महासागरके अगाध जलमें वेदोंको धारण किया तथा स्वयं अपने सींगसे नौकाको ग्रहण करके उसमें सम्पूर्ण प्रकारके बीजों तथा मनु सहित सप्तर्षियोंको प्रलयकाल तक धारण कर बिना प्रयासके ही उनका वहन करते हुए उनकी रक्षा की। इस अवतारमें उन्होंने सत्यव्रत मुनिकी भी रक्षा की थी। अतएव मत्स्यावतारधारी भगवान् केशवकी जय हो। प्रस्तुत पदमें ऊर्ध्वमागधी रीति, उपमा और अतिशयोक्ति अलङ्कार, उत्साह नामक स्थायी-भाव तथा वीररस है। मत्स्यावतारको वीभत्स रसका अधिष्ठाता भी कहा गया है॥ १ ॥ क्षितिरतिविपुलतरे तिष्ठति तव पृष्ठे धरणि–धरणकिण–चक्रगरिष्ठे । केशव धृत–कूर्मशरीर जय जगदीश हरे ॥ २ ॥
२२ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—हे केशव ! हे धृतकच्छपरूप ! (स्वीकृत-कच्छप -विग्रह) क्षितिः (मेदिनी) धरणि-धरण-किणचक्र-गरिष्ठे (धरण्याः धरणेन बहनेन यत् किणचक्रं कठिनी-भूतत्वक्समूहः) तेन गरिष्ठे सुदृढ़े विपुलतरे (अतिविशाले) तव पृष्ठे तिष्ठति; हे जगदीश, हे हरे, त्वं जय (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तस्व) ॥२॥ अनुवाद—हे केशिनिसूदन ! हे जगदीश ! हे हरे ! आपने कूर्मरूप अङ्गीकार कर अपने विशाल पृष्ठके एक प्रान्तमें पृथ्वीको धारण किया है, जिससे आपकी पीठ व्रणके चिह्नोंसे गौरवान्वित हो रही है। आपकी जय हो॥२॥ पद्यानुवाद— राजित पृष्ठे निज क्षिति विपुला, धरणी धरण-किण अङ्कित बहुला, केशव कच्छप रूप लसे, जय जगदीश हरे॥२॥ बालबोधिनी—अष्टपदीके द्वितीय श्लोकमें श्रीभगवान्के कच्छपावतारका वर्णन किया है। आपने इस पृथ्वी (मन्दराचल) को मात्र आकर्षित ही नहीं किया अपितु अपनी पीठपर धारण करते हुए स्थापन किया है। कच्छपावतार धारण करके श्रीभगवान् पृथ्वीके नीचे विद्यमान हैं और पृथ्वीकी अपेक्षा अत्यधिक विशाल उनके पृष्ठपर यह भूमण्डल एक गेंदकी भाँति अवस्थित है। पृथ्वीके धारण करनेसे उनके पृष्ठपर घाव-चिह्न जाल-सा बन गया है। यह व्रण-चिह्न-जाल आपका अलङ्कार ही है। आपकी जय हो। जय जगदीश हरे! मुखबन्धकी भाँति यह सम्पुट सम्पूर्ण अष्टपदीसे संयोजित है॥२॥ वसति दशनशिखरे धरणी तव लग्ना शशिनि कलङ्ककलेव निमग्ना। केशव धृत-शूकररूप जय जगदीश हरे॥३॥
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः २३ अन्वय—हे केशव ! हे धृत-शूकररूप ! (स्वीकृत-वराह- विग्रह) तव दशनशिखरे (दन्ताग्रे) लग्ना (अवस्थिता) धरणी (पृथिवी, लोकधारणकर्त्रीपि); शशिनि (चन्द्रे) निमग्ना कलङ्ककला (कलङ्करेखा) इव वसति (अवतिष्ठते); हे जगदीश, हे हरे, त्वं जय (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तस्व) ॥३॥ अनुवाद—हे जगदीश ! हे केशव ! हे हरे ! हे वराहरूपधारी ! जिस प्रकार चन्द्रमा अपने भीतर कलङ्कके सहित सम्मिलित रूपसे दिखाई देता है, उसी प्रकार आपके दाँतोंके ऊपर पृथ्वी अवस्थित है ॥३॥ पद्यानुवाद— दशन अग्र धरणी यह लग्ना, शोभित चन्द्र कलङ्क निमग्ना। केशव सूकर-रूप लसे, जय जगदीश हरे ॥३॥ बालबोधिनी—अष्टपदीके तृतीय पदमें भगवान्की स्तुति की गयी है। भगवान् पृथ्वीको धारण करते हैं, इतना ही नहीं, समस्त चराचरको धारण करनेवाली पृथ्वीको अपने दाँतोंपर अवस्थित कर चलते भी हैं। सृष्टिके प्रारम्भमें हिरण्याक्ष जब बीजभूता पृथ्वीका अपहरण करके रसातलमें चला गया था, तो श्रीभगवान्ने वराहरूप धारण किया और प्रलयकालीन जलके भीतर प्रविष्ट होकर अपने दाँतोंके अग्रभागपर पृथ्वीको उठाकर ऊपर ले आये तथा अपने सत्यसङ्कल्परूपी योगबलके द्वारा उसे जलके ऊपर स्थापित किया। जिस समय भगवान् अपने दाँतोंके अग्रभागपर पृथ्वीको उठाकर ला रहे थे, उस समय उनके उज्ज्वल दाँतोंके ऊपर पृथ्वी ऐसे सुशोभित हो रही थी, जिस प्रकार चन्द्रमाके भीतर उसके बीचमें उसकी कालिमा सुशोभित होती है। कविने भगवान्के दाँतोंको बालचन्द्रमाकी उपमा देकर उनके दाँतोंके महदाकारत्व तथा धरणीके अल्पाकारत्वको सूचित किया है। धरणी कलङ्क कलावत् निमग्ना है। निमग्न
२४ श्रीगीतगोविन्दम् शब्दसे वराहदेव भयानक रसके अधिष्ठाता रूपमें प्रकाशित होते हैं। इस पदमें उपमा अलङ्कार है। हे शूकररूप धारिण ! आपकी जय हो॥३॥ तव करकमलवरे नखमद्भुतशृङ्गम् दलितहिरण्यकशिपु-तनुभृङ्गम्। केशव धृत-नरहरिरूप जय जगदीश हरे ॥४॥ अन्वय—हे केशव ! हे धृत-नरहरिरूप ! (नृसिंहरूपधर) तब कर-कमलवरे (पाणिपङ्कज-श्रेष्ठे) अद्भुतशृङ्गं (अद्भुतं शृङ्गम् अग्रं यस्य तादृशं) दलित-हिरण्यकशिपु-तनु-भृङ्गं (दलिता विदारिता हिरण्यकशिपोः असुरराजस्य या तनुः शरीरं सा एव भृङ्गः येन तथाभूतं) नखं [शोभते इति शेषः], [अतिकोमलेन करकमल-केसरेण सुदृढ़-दैत्यदेहरूपभृङ्गदलनम् अदृष्टचरम्; अतएव अद्भुतम्] हे जगदीश, हे हरे, त्वं जय (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तस्व) ॥४॥ अनुवाद—हे जगदीश्वर ! हे हरे ! हे केशव ! आपने नृसिंह रूप धारण किया है। आपके श्रेष्ठ करकमलमें नखरूपी अद्भुत शृङ्ग विद्यमान है, जिससे हिरण्यकशिपुके शरीरको आपने ऐसे विदीर्ण कर दिया जैसे भ्रमर पुष्पका विदारण कर देता है, आपकी जय हो ॥४॥ पद्यानुवाद— अम्बुज कर खर नखसे अपने, हिरण्यकशिपुके हर सब सपने। केशव नरहरि-रूप लसे, जय जगदीश हरे ॥४॥ बालबोधिनी—चौथे पद्यमें श्रीजयदेवजीने नृसिंहावतारके रूपमें भगवान्का स्तवन किया है। दुःखकातर भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं कष्ट स्वीकार कर लेते हैं, पर दूसरोंका दुःख सहन नहीं कर पाते। दितिपुत्र हिरण्यकशिपुने अपने पुत्र
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः २५ महाभागवत प्रह्लादपर अत्याचार किया तो भगवान्ने नृसिंह वेशमें उस महादैत्यके वक्षःस्थलको निज नखसे विदीर्णकर उनकी रक्षा की। हे नरहरि रूप धारण करनेवाले केशव ! आपके श्रेष्ठ करकमलमें नख समुदाय एक श्रेष्ठ कमलके अग्रभागके समान हैं, उनमें अति तीक्ष्णता है। यह नख समुदाय अति अद्भुत, पहाड़ की चोटीके समान अति आश्चर्यजनक है। कमलाग्ररूप इन नखोंका यह वैशिष्ट्य है कि अन्य कमलके अग्रभागोंको तो भ्रमर विदीर्ण करते हैं, परन्तु आपके करकमलोंके अग्रभागने तो दैत्यरूपी भ्रमरका ही दलन कर दिया है। विश्वकोषमें शृङ्ग शब्दका अर्थ बजाने वाला विषाण, उत्कर्ष एवं अग्रभाग है। भ्रमरके उदाहरणसे कृष्ण-वर्णत्वको भी सूचित किया गया है। यह रूपक अलङ्कार है। श्रीनृसिंह रूपको वात्सल्यरसका अधिष्ठान माना जाता है॥४॥ छलयसि विक्रमणे बलिमद्भुतवामन पद-नख-नीर-जनितजनपावन। केशव धृत-वामनरूप जय जगदीश हरे ॥५ ॥ अन्वय—हे केशव ! हे धृतवामनरूप ! (वामनरूपधर) हे पद-नख-नीर-जनित-जन-पावन (पदनख-नीरेण पदनखोद्भूतेन गङ्गाजलेन जनितं जनानां पावनं पवित्रता येन) हे अद्भुतवामन ! (अपूर्ववामनमूर्त्तिधारिन्), विक्रमणे (पादत्रयेन त्रिभुवनाक्रमणेन) बलिं (दानवपतिम् अतिदातृत्वगविणं) छलयसि (प्रतारयसि)। हे जगदीश, हे हरे, त्वं जय॥५॥ अनुवाद—हे सम्पूर्ण जगतके स्वामिन् ! हे श्रीहरे ! हे केशव ! आप वामन रूप धारणकर तीन पग धरतीकी याचनाकी क्रियासे बलि राजाकी वञ्चना कर रहे हैं। यह लोक समुदाय आपके पद-नख-स्थित सलिलसे पवित्र हुआ है। हे अद्भुत वामन देव ! आपकी जय हो॥५॥
२६ श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— छलित नृपति बलि अद्भुत वामन, पदनख नीर हुए जन पावन। केशव वामन-रूप लसे, जय जगदीश हरे ॥५॥ बालबोधिनी—पाँचवे पद्यमें वामनदेवकी स्तुति की गयी है। राजा बलिकी यज्ञशालामें जाकर आपने भिक्षाके छलसे त्रिविक्रमरूप धारणकर ऊपर नीचेके समस्त लोक नाप लिये हैं। छलयसि—इसमें वर्त्तमान कालिक क्रियापदका प्रयोग है, अर्थात् बलिको अपने वरदानसे अनुगृहीतकर उसके साथ पातालमें निवास करते हैं और अनादि कालसे ही अद्भुत वामन बनकर उसे छला करते हैं। पदनख नीर जनित जन पावनसे तात्पर्य है कि उन्होंने अपने पद-नखोंसे श्रीगङ्गाको यहाँ प्रकटकर समस्त संसारको पावन किया है। ब्रह्माजीने पृथ्वी नापते समय भगवान्के चरणोंको ब्रह्मलोकमें देखकर अर्घ्य चढ़ाया। वही जल श्रीगङ्गाजीके रूपमें परिणत हो गया। आपकी जय हो। इस पद्यमें अद्भुत रस है, यहाँपर श्रीभगवान् सख्य रसके अधिष्ठाता रूपमें प्रकाशित हुए हैं॥५॥ क्षत्रिय-रुधिरमये जगदपगत-पापम् स्नपयसि पयसि शमित-भवतापम्। केशव धृत-भृगुपतिरूप जय जगदीश हरे ॥६॥ अन्वय—हे केशव ! हे धृतभृगुपतिरूप ! (धृतपरशुरामविग्रह)। [हैययवंशीयैरुन्मार्ग-प्रस्थितैः नृपकुलापसदैः समाधावासक्तं पितरं महर्षि जमदग्निं निहतमवगम्य पितृ-वधामर्षजकोपात् गुरुतरपरशुमादाय] क्षत्रियरुधिरमये (क्षत्रशोणितरूपे) पयसि (जले) अपगतपापम् (अपगतानि पापानि यस्य तत्) [अतएव] शमित-भवतापम् (शमितः उपशमतां प्राप्तः भवस्य संसारस्य
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः २७ तापः सन्तापो यस्य तादृशं) जगत् स्नपयसि (प्रक्षालयसि)। हे जगदीश, हे हरे, त्वं जय॥६॥ अनुवाद—हे जगदीश ! हे हरे ! हे केशिनिसूदन ! आपने भृगु (परशुराम) रूप धारणकर क्षत्रियकुलका विनाश करते हुए उनके रक्तमय सलिलसे जगतको पवित्र कर संसारका सन्ताप दूर किया है। हे भृगुपतिरूपधारिन्, आपकी जय हो॥६॥ पद्यानुवाद— 'वीर-रुधिर' से धो पापोंको, और शमन कर भव-तापोंको। केशव भृगुपति-रूप लसे, जय जगदीश हरे॥६॥ बालबोधिनी—छठवें पद्यमें श्रीपरशुराम अवतारकी स्तुति की है, हे प्रभो ! भृगुपतिरूप धारणकर आपने एकबार नहीं, इकतीस बार ब्राह्मणविद्वेषी क्षत्रियोंका विनाशकर उनके रुधिरसे निर्मित सरोवरको कुरुक्षेत्रका हृद तीर्थ बना दिया है, जिसमें स्नान करनेसे समस्त जगतके प्राणियोंके पापोंका मोचन होता है और संसारके समस्त तापोंसे मुक्ति मिलती है। ज्ञानकी उत्पत्ति होनेसे उत्तापोंकी शान्ति होती है। प्रस्तुत पदमें स्वभाविकोक्ति अलङ्कार तथा अद्भुत रस है। परशुराम अवतारको रौद्र रसका अधिष्ठाता माना जाता है। यहाँतक छह पद्योंके नायकको धीरोद्धत नायक कहा जाता है॥६॥ वितरसि दिक्षु रणे दिक्पति-कमनीयं दशमुख-मौलि-बलिं रमणीयम्। केशव धृत-रामशरीर जय जगदीश हरे॥७॥ अन्वय—हे केशव ! हे धृत-रघुपतिरूप ! (स्वीकृत-दाशरथि -देह) रणे (युद्धे) दिक्पति-कमनीयं (दिशां पतीनाम् इन्द्रादिलोकपालानां कमनीयं वाञ्छनीयं) [दशसु] दिक्षु रमणीयं
२८ श्रीगीतगोविन्दम् (शोभाकरं) दशमुखमौलिवलिं (रावणदशमुण्डोपहारं) वितरसि (ददासि)। हे जगदीश, हे हरे, त्वं जय ॥७॥ अनुवाद—हे जगत् स्वामिन् श्रीहरे ! हे केशिनिसूदन ! आपने रामरूप धारण कर संग्राममें इन्द्रादि दिक्पालोंको कमनीय और अत्यन्त मनोहर रावणके किरीट भूषित शिरोंकी बलि दशदिशाओंमें वितरित कर रहे हैं। हे रामस्वरूप ! आपकी जय हो ॥७॥ पद्यानुवाद— दिक्पति कान्ति हुई कमनीया, पा रावणकी बलि रमणीया। केशव रघुपति-रूप लसे, जय जगदीश हरे ॥७॥ बालबोधिनी—सातवें पद्यमें श्रीराम-स्वरूपका वर्णन हुआ है। हे प्रभो ! प्रिया वियोगादि दुःखको सहन करनेके लिए आप रघुकुल तिलक श्रीराम रूपमें अवतरित हुए। भयानक संग्राममें संसारको रुलानेवाले रावणके दश मस्तकोंको अनन्तकालके लिए समर्पित कर दिया है अर्थात् रावणके शिरोंको काटकर श्रीभगवान्ने दिक्पालोंको बलि चढ़ाया जिससे कि संसारमें राक्षसोंके द्वारा बढ़े हुए उत्पातोंकी शान्ति हो जाय। दिक्पालोंको रावणकी बलि अत्यन्त अभीष्ट थी। रावणका वध हो जानेसे यह बलि लोकाभिराम बनी। इस बातको जयदेव कविने 'दिक्पति कमनीयम्' एवं 'रमणीयम्' इन दो पदोंके द्वारा अभिव्यक्त किया है। दिक्पालोंकी संख्या दश है तथा रावणके किरीट मण्डित शिरोंकी संख्या भी दश ही है। यही कारण है कि दिक्पालोंको यह बलि अत्यन्त कमनीय थी। दूसरोंको उद्वेग देनेवाले रावणका संहारकर भगवान्ने जगतमें सभीका आनन्दवर्द्धन किया है। इस पदके नायक धीरोदात्त हैं। भगवान्के राम अवतारमें करुण रसका प्रकाश होता है।
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः २९ दशमुख मौलि बलिम्—इस पदकी व्युत्पत्ति दशमुखस्य ये मौलया तान्येव बलिम् अर्थात् रावणके किरीट मण्डित शिर ही बलि हैं। यद्यपि मौलि शब्द शिर और किरीट दोनोंका वाचक है तथापि मौलि मण्डित शिर यह अर्थ तटस्थ लक्षणके द्वारा स्वीकार किया जाता है॥७॥ वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभम् हलहति-भीति-मिलित-यमुनाभम्। केशव धृत-हलधररूप जय जगदीश हरे ॥८॥ अन्वय—हे केशव ! हे धृतहलधररूप ! (धृतबलदेवशरीर !) त्वं विशदे (शुभ्रे) वपुषि (देहे) जलदाभं (नवघनश्यामं) [अतएव] हल-हति-भीति-मिलित-यमुनाभं (हलस्य लाङ्गलस्य हत्या आघातेन या भीतिः तया मिलिता पादपतिता शरणागता इति यावत् या यमुना तस्या भाः प्रभाइव भा दीप्तिर्यस्य तादृशं) वसनं (वस्त्रं नीलाम्बरमित्यर्थः) वहसि (धारयसि)। हे जगदीश, हे हरे, त्वं जय ॥८॥ अनुवाद—हे जगत् स्वामिन् ! हे केशिनिसूदन ! हे हरे ! आपने बलदेवस्वरूप धारण कर अति शुभ्र गौरवर्ण होकर नवीन जलदाभ अर्थात् नूतन मेघोंकी शोभाके सदृश नील वस्त्रोंको धारण किया है। ऐसा लगता है, यमुनाजी मानो आपके हलके प्रहारसे भयभीत होकर आपके वस्त्रमें छिपी हुई हैं। हे हलधरस्वरूप ! आपकी जय हो॥८॥ पद्यानुवाद— घन सम वसन विशद तन धारे, यमुन-तरङ्गित हल-भय मारे। केशव हलधर-रूप लसे जय जगदीश हरे ॥८॥ बालबोधिनी—आठवें पदमें भगवान्के हलधारी श्रीबलराम- स्वरूपकी स्तुति की जा रही है। विशद वपु-बलरामजीका वर्ण गौर है, वे शुभ्र हैं।
३० श्रीगीतगोविन्दम् जलदाभ-बलरामजी नील हरित वर्णका वस्त्र धारण करते हैं। जलसे भरे कृष्णवर्णके मेघको जलद कहते हैं। जलदस्य आभा-श्यामा यस्य तम्-यह जलदाभ पदका विग्रह है। जलद कृषकको जिस प्रकार आनन्दित करता है, उसी प्रकार बलरामजीके वस्त्र भक्तोंको आनन्द प्रदान करते हैं। हलहतिभीति मिलित यमुनाभम्-हलेन या हतिः तद् भीत्या मिलिता या यमुना तस्या आभा इव आभा यस्य तत्। भगवान् केवल प्रिया-वियोगादि-दुःख सहन नहीं कर पाते, ऐसा नहीं है। आपने प्रेयसीके श्रमरूप क्लेशको दूर करने हेतु अपनी प्रिय भक्त यमुनाजीको आकर्षित किया है। आपके शुभ्र कान्ति विशिष्ट श्रीअङ्गमें धारण किये हुए नील वसनोंसे ऐसा लगता है मानो आपके हलके प्रहारसे भयभीत होकर यमुनाजी आपके नीले सुरम्य वस्त्रोंमें समा गयी हैं। प्रस्तुत पदके नायक श्रीबलरामजी धीर ललित नायक हैं। इन्हें हास्य रसका अधिष्ठाता माना जाता है ॥८॥ निन्दसि यज्ञ-विधेरहह श्रुतिजातम् सदय-हृदय दर्शितपशुघातम्। केशव धृत-बुद्धशरीर जय जगदीश हरे ॥९॥ अन्वय- हे केशव ! हे सदय-हृदय ! (पशुष्वपि करुणामयचित्त) धृतबुद्धशरीर ! (बुद्धरूपधर ! अहह (खेदे), दर्शित-पशुघातं (दैत्यमोहनाय अहिंसा परमोधर्म इति दर्शितः पशुघातः यस्मिन् तथोक्तं) यज्ञविधेः (क्रतुविधानस्य) श्रुतिजातं (पशुना रुद्रं यजेत इत्यादिकं वेदकामसमूहं) निन्दसि। [वेदान् स्वयमेव प्रकाश्य स्वयमेव तान् निन्दसीत्यद्भुतमित्यर्थः] हे जगदीश, हे हरे, त्वं जय ॥९॥ अनुवाद-हे जगदीश्वर ! हे हरे ! हे केशिनिसूदन ! आपने बुद्ध शरीर धारण कर सदय और सहृदय होकर यज्ञ विधानों
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३१ द्वारा पशुओंकी हिंसा देखकर श्रुति समुदायकी निन्दा की है। आपकी जय हो ॥९॥ पद्यानुवाद— निन्दे यज्ञ नियम श्रुति-मगके, माने मानव सम पशु जगके। केशव बुद्ध-शरीर लसे, जय जगदीश हरे ॥९॥ बालबोधिनी—नवें पदमें भगवान्के बुद्धावतारकी स्तुति की जा रही है। वेद श्रीभगवान्के श्वासस्वरूप हैं; 'तस्य निःश्वसितं वेदाः'। वेदोंको स्वयं भगवान्की आज्ञास्वरूप माना जाता है। वेद शास्त्रोंमें जब विरोधी मत अर्थात् वेदोंके विरुद्ध विचार धाराएँ बढ़ने लगीं, तब आपने बुद्धावतार ग्रहण किया। यह प्रश्न होता है कि स्वयं यज्ञ विधिको बनाकर फिर यज्ञ विधायिका श्रुतियोंकी क्यों निन्दा की? अत्यन्त आश्चर्यकी बात है कि स्वयं ही वेदोंके प्रकाशक हैं और स्वयं ही वेदोंकी भर्त्सना कर रहे हैं। इसके उत्तरमें 'सदय हृदय दर्शित पशुघातम्' अर्थात् आपने पशुओंके प्रति दयावान् होकर अहिंसा परमो धर्मः, यह उपदेश प्रदानकर दैत्योंको मोहित किया है। आपने जैसे अमृतकी रक्षा करनेके लिए दैत्योंको मोहित किया था, उसी प्रकार प्राणियोंकी रक्षा करनेके लिए आपने दैत्योंको मोहितकर यज्ञोंको अनुचित बतलाया है। यज्ञमें की जानेवाली पशुओंकी हिंसाको देखकर श्रीभगवान्के हृदयमें दया प्रसूत हुई और दया विवश होकर अपने इस अवतारमें यज्ञ प्रतिपादक वेद शास्त्रोंकी निन्दा की। इस पदके नायक धीर शान्त हैं। भगवान् बुद्धको शान्त रसका अधिष्ठाता माना गया है॥९॥ म्लेच्छ-निवहनिधने कलयसि करवालं धूमकेतुमिव किमपि करालम्। केशव धृत-कल्किशरीर जय जगदीश हरे ॥१०॥