गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३१ द्वारा पशुओंकी हिंसा देखकर श्रुति समुदायकी निन्दा की है। आपकी जय हो ॥९॥ पद्यानुवाद— निन्दे यज्ञ नियम श्रुति-मगके, माने मानव सम पशु जगके। केशव बुद्ध-शरीर लसे, जय जगदीश हरे ॥९॥ बालबोधिनी—नवें पदमें भगवान्के बुद्धावतारकी स्तुति की जा रही है। वेद श्रीभगवान्के श्वासस्वरूप हैं; 'तस्य निःश्वसितं वेदाः'। वेदोंको स्वयं भगवान्की आज्ञास्वरूप माना जाता है। वेद शास्त्रोंमें जब विरोधी मत अर्थात् वेदोंके विरुद्ध विचार धाराएँ बढ़ने लगीं, तब आपने बुद्धावतार ग्रहण किया। यह प्रश्न होता है कि स्वयं यज्ञ विधिको बनाकर फिर यज्ञ विधायिका श्रुतियोंकी क्यों निन्दा की? अत्यन्त आश्चर्यकी बात है कि स्वयं ही वेदोंके प्रकाशक हैं और स्वयं ही वेदोंकी भर्त्सना कर रहे हैं। इसके उत्तरमें 'सदय हृदय दर्शित पशुघातम्' अर्थात् आपने पशुओंके प्रति दयावान् होकर अहिंसा परमो धर्मः, यह उपदेश प्रदानकर दैत्योंको मोहित किया है। आपने जैसे अमृतकी रक्षा करनेके लिए दैत्योंको मोहित किया था, उसी प्रकार प्राणियोंकी रक्षा करनेके लिए आपने दैत्योंको मोहितकर यज्ञोंको अनुचित बतलाया है। यज्ञमें की जानेवाली पशुओंकी हिंसाको देखकर श्रीभगवान्के हृदयमें दया प्रसूत हुई और दया विवश होकर अपने इस अवतारमें यज्ञ प्रतिपादक वेद शास्त्रोंकी निन्दा की। इस पदके नायक धीर शान्त हैं। भगवान् बुद्धको शान्त रसका अधिष्ठाता माना गया है॥९॥ म्लेच्छ-निवहनिधने कलयसि करवालं धूमकेतुमिव किमपि करालम्। केशव धृत-कल्किशरीर जय जगदीश हरे ॥१०॥