भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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३० श्रीगीतगोविन्दम् जलदाभ-बलरामजी नील हरित वर्णका वस्त्र धारण करते हैं। जलसे भरे कृष्णवर्णके मेघको जलद कहते हैं। जलदस्य आभा-श्यामा यस्य तम्-यह जलदाभ पदका विग्रह है। जलद कृषकको जिस प्रकार आनन्दित करता है, उसी प्रकार बलरामजीके वस्त्र भक्तोंको आनन्द प्रदान करते हैं। हलहतिभीति मिलित यमुनाभम्-हलेन या हतिः तद् भीत्या मिलिता या यमुना तस्या आभा इव आभा यस्य तत्। भगवान् केवल प्रिया-वियोगादि-दुःख सहन नहीं कर पाते, ऐसा नहीं है। आपने प्रेयसीके श्रमरूप क्लेशको दूर करने हेतु अपनी प्रिय भक्त यमुनाजीको आकर्षित किया है। आपके शुभ्र कान्ति विशिष्ट श्रीअङ्गमें धारण किये हुए नील वसनोंसे ऐसा लगता है मानो आपके हलके प्रहारसे भयभीत होकर यमुनाजी आपके नीले सुरम्य वस्त्रोंमें समा गयी हैं। प्रस्तुत पदके नायक श्रीबलरामजी धीर ललित नायक हैं। इन्हें हास्य रसका अधिष्ठाता माना जाता है ॥८॥ निन्दसि यज्ञ-विधेरहह श्रुतिजातम् सदय-हृदय दर्शितपशुघातम्। केशव धृत-बुद्धशरीर जय जगदीश हरे ॥९॥ अन्वय- हे केशव ! हे सदय-हृदय ! (पशुष्वपि करुणामयचित्त) धृतबुद्धशरीर ! (बुद्धरूपधर ! अहह (खेदे), दर्शित-पशुघातं (दैत्यमोहनाय अहिंसा परमोधर्म इति दर्शितः पशुघातः यस्मिन् तथोक्तं) यज्ञविधेः (क्रतुविधानस्य) श्रुतिजातं (पशुना रुद्रं यजेत इत्यादिकं वेदकामसमूहं) निन्दसि। [वेदान् स्वयमेव प्रकाश्य स्वयमेव तान् निन्दसीत्यद्भुतमित्यर्थः] हे जगदीश, हे हरे, त्वं जय ॥९॥ अनुवाद-हे जगदीश्वर ! हे हरे ! हे केशिनिसूदन ! आपने बुद्ध शरीर धारण कर सदय और सहृदय होकर यज्ञ विधानों