भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः २९ दशमुख मौलि बलिम्—इस पदकी व्युत्पत्ति दशमुखस्य ये मौलया तान्येव बलिम् अर्थात् रावणके किरीट मण्डित शिर ही बलि हैं। यद्यपि मौलि शब्द शिर और किरीट दोनोंका वाचक है तथापि मौलि मण्डित शिर यह अर्थ तटस्थ लक्षणके द्वारा स्वीकार किया जाता है॥७॥ वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभम् हलहति-भीति-मिलित-यमुनाभम्। केशव धृत-हलधररूप जय जगदीश हरे ॥८॥ अन्वय—हे केशव ! हे धृतहलधररूप ! (धृतबलदेवशरीर !) त्वं विशदे (शुभ्रे) वपुषि (देहे) जलदाभं (नवघनश्यामं) [अतएव] हल-हति-भीति-मिलित-यमुनाभं (हलस्य लाङ्गलस्य हत्या आघातेन या भीतिः तया मिलिता पादपतिता शरणागता इति यावत् या यमुना तस्या भाः प्रभाइव भा दीप्तिर्यस्य तादृशं) वसनं (वस्त्रं नीलाम्बरमित्यर्थः) वहसि (धारयसि)। हे जगदीश, हे हरे, त्वं जय ॥८॥ अनुवाद—हे जगत् स्वामिन् ! हे केशिनिसूदन ! हे हरे ! आपने बलदेवस्वरूप धारण कर अति शुभ्र गौरवर्ण होकर नवीन जलदाभ अर्थात् नूतन मेघोंकी शोभाके सदृश नील वस्त्रोंको धारण किया है। ऐसा लगता है, यमुनाजी मानो आपके हलके प्रहारसे भयभीत होकर आपके वस्त्रमें छिपी हुई हैं। हे हलधरस्वरूप ! आपकी जय हो॥८॥ पद्यानुवाद— घन सम वसन विशद तन धारे, यमुन-तरङ्गित हल-भय मारे। केशव हलधर-रूप लसे जय जगदीश हरे ॥८॥ बालबोधिनी—आठवें पदमें भगवान्के हलधारी श्रीबलराम- स्वरूपकी स्तुति की जा रही है। विशद वपु-बलरामजीका वर्ण गौर है, वे शुभ्र हैं।

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