भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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२८ श्रीगीतगोविन्दम् (शोभाकरं) दशमुखमौलिवलिं (रावणदशमुण्डोपहारं) वितरसि (ददासि)। हे जगदीश, हे हरे, त्वं जय ॥७॥ अनुवाद—हे जगत् स्वामिन् श्रीहरे ! हे केशिनिसूदन ! आपने रामरूप धारण कर संग्राममें इन्द्रादि दिक्पालोंको कमनीय और अत्यन्त मनोहर रावणके किरीट भूषित शिरोंकी बलि दशदिशाओंमें वितरित कर रहे हैं। हे रामस्वरूप ! आपकी जय हो ॥७॥ पद्यानुवाद— दिक्पति कान्ति हुई कमनीया, पा रावणकी बलि रमणीया। केशव रघुपति-रूप लसे, जय जगदीश हरे ॥७॥ बालबोधिनी—सातवें पद्यमें श्रीराम-स्वरूपका वर्णन हुआ है। हे प्रभो ! प्रिया वियोगादि दुःखको सहन करनेके लिए आप रघुकुल तिलक श्रीराम रूपमें अवतरित हुए। भयानक संग्राममें संसारको रुलानेवाले रावणके दश मस्तकोंको अनन्तकालके लिए समर्पित कर दिया है अर्थात् रावणके शिरोंको काटकर श्रीभगवान्ने दिक्पालोंको बलि चढ़ाया जिससे कि संसारमें राक्षसोंके द्वारा बढ़े हुए उत्पातोंकी शान्ति हो जाय। दिक्पालोंको रावणकी बलि अत्यन्त अभीष्ट थी। रावणका वध हो जानेसे यह बलि लोकाभिराम बनी। इस बातको जयदेव कविने 'दिक्पति कमनीयम्' एवं 'रमणीयम्' इन दो पदोंके द्वारा अभिव्यक्त किया है। दिक्पालोंकी संख्या दश है तथा रावणके किरीट मण्डित शिरोंकी संख्या भी दश ही है। यही कारण है कि दिक्पालोंको यह बलि अत्यन्त कमनीय थी। दूसरोंको उद्वेग देनेवाले रावणका संहारकर भगवान्ने जगतमें सभीका आनन्दवर्द्धन किया है। इस पदके नायक धीरोदात्त हैं। भगवान्के राम अवतारमें करुण रसका प्रकाश होता है।