भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः २७ तापः सन्तापो यस्य तादृशं) जगत् स्नपयसि (प्रक्षालयसि)। हे जगदीश, हे हरे, त्वं जय॥६॥ अनुवाद—हे जगदीश ! हे हरे ! हे केशिनिसूदन ! आपने भृगु (परशुराम) रूप धारणकर क्षत्रियकुलका विनाश करते हुए उनके रक्तमय सलिलसे जगतको पवित्र कर संसारका सन्ताप दूर किया है। हे भृगुपतिरूपधारिन्, आपकी जय हो॥६॥ पद्यानुवाद— 'वीर-रुधिर' से धो पापोंको, और शमन कर भव-तापोंको। केशव भृगुपति-रूप लसे, जय जगदीश हरे॥६॥ बालबोधिनी—छठवें पद्यमें श्रीपरशुराम अवतारकी स्तुति की है, हे प्रभो ! भृगुपतिरूप धारणकर आपने एकबार नहीं, इकतीस बार ब्राह्मणविद्वेषी क्षत्रियोंका विनाशकर उनके रुधिरसे निर्मित सरोवरको कुरुक्षेत्रका हृद तीर्थ बना दिया है, जिसमें स्नान करनेसे समस्त जगतके प्राणियोंके पापोंका मोचन होता है और संसारके समस्त तापोंसे मुक्ति मिलती है। ज्ञानकी उत्पत्ति होनेसे उत्तापोंकी शान्ति होती है। प्रस्तुत पदमें स्वभाविकोक्ति अलङ्कार तथा अद्भुत रस है। परशुराम अवतारको रौद्र रसका अधिष्ठाता माना जाता है। यहाँतक छह पद्योंके नायकको धीरोद्धत नायक कहा जाता है॥६॥ वितरसि दिक्षु रणे दिक्पति-कमनीयं दशमुख-मौलि-बलिं रमणीयम्। केशव धृत-रामशरीर जय जगदीश हरे॥७॥ अन्वय—हे केशव ! हे धृत-रघुपतिरूप ! (स्वीकृत-दाशरथि -देह) रणे (युद्धे) दिक्पति-कमनीयं (दिशां पतीनाम् इन्द्रादिलोकपालानां कमनीयं वाञ्छनीयं) [दशसु] दिक्षु रमणीयं