भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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२६ श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— छलित नृपति बलि अद्भुत वामन, पदनख नीर हुए जन पावन। केशव वामन-रूप लसे, जय जगदीश हरे ॥५॥ बालबोधिनी—पाँचवे पद्यमें वामनदेवकी स्तुति की गयी है। राजा बलिकी यज्ञशालामें जाकर आपने भिक्षाके छलसे त्रिविक्रमरूप धारणकर ऊपर नीचेके समस्त लोक नाप लिये हैं। छलयसि—इसमें वर्त्तमान कालिक क्रियापदका प्रयोग है, अर्थात् बलिको अपने वरदानसे अनुगृहीतकर उसके साथ पातालमें निवास करते हैं और अनादि कालसे ही अद्भुत वामन बनकर उसे छला करते हैं। पदनख नीर जनित जन पावनसे तात्पर्य है कि उन्होंने अपने पद-नखोंसे श्रीगङ्गाको यहाँ प्रकटकर समस्त संसारको पावन किया है। ब्रह्माजीने पृथ्वी नापते समय भगवान्‌के चरणोंको ब्रह्मलोकमें देखकर अर्घ्य चढ़ाया। वही जल श्रीगङ्गाजीके रूपमें परिणत हो गया। आपकी जय हो। इस पद्यमें अद्भुत रस है, यहाँपर श्रीभगवान् सख्य रसके अधिष्ठाता रूपमें प्रकाशित हुए हैं॥५॥ क्षत्रिय-रुधिरमये जगदपगत-पापम् स्नपयसि पयसि शमित-भवतापम्। केशव धृत-भृगुपतिरूप जय जगदीश हरे ॥६॥ अन्वय—हे केशव ! हे धृतभृगुपतिरूप ! (धृतपरशुरामविग्रह)। [हैययवंशीयैरुन्मार्ग-प्रस्थितैः नृपकुलापसदैः समाधावासक्तं पितरं महर्षि जमदग्निं निहतमवगम्य पितृ-वधामर्षजकोपात् गुरुतरपरशुमादाय] क्षत्रियरुधिरमये (क्षत्रशोणितरूपे) पयसि (जले) अपगतपापम् (अपगतानि पापानि यस्य तत्) [अतएव] शमित-भवतापम् (शमितः उपशमतां प्राप्तः भवस्य संसारस्य