गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः २५ महाभागवत प्रह्लादपर अत्याचार किया तो भगवान्ने नृसिंह वेशमें उस महादैत्यके वक्षःस्थलको निज नखसे विदीर्णकर उनकी रक्षा की। हे नरहरि रूप धारण करनेवाले केशव ! आपके श्रेष्ठ करकमलमें नख समुदाय एक श्रेष्ठ कमलके अग्रभागके समान हैं, उनमें अति तीक्ष्णता है। यह नख समुदाय अति अद्भुत, पहाड़ की चोटीके समान अति आश्चर्यजनक है। कमलाग्ररूप इन नखोंका यह वैशिष्ट्य है कि अन्य कमलके अग्रभागोंको तो भ्रमर विदीर्ण करते हैं, परन्तु आपके करकमलोंके अग्रभागने तो दैत्यरूपी भ्रमरका ही दलन कर दिया है। विश्वकोषमें शृङ्ग शब्दका अर्थ बजाने वाला विषाण, उत्कर्ष एवं अग्रभाग है। भ्रमरके उदाहरणसे कृष्ण-वर्णत्वको भी सूचित किया गया है। यह रूपक अलङ्कार है। श्रीनृसिंह रूपको वात्सल्यरसका अधिष्ठान माना जाता है॥४॥ छलयसि विक्रमणे बलिमद्भुतवामन पद-नख-नीर-जनितजनपावन। केशव धृत-वामनरूप जय जगदीश हरे ॥५ ॥ अन्वय—हे केशव ! हे धृतवामनरूप ! (वामनरूपधर) हे पद-नख-नीर-जनित-जन-पावन (पदनख-नीरेण पदनखोद्भूतेन गङ्गाजलेन जनितं जनानां पावनं पवित्रता येन) हे अद्भुतवामन ! (अपूर्ववामनमूर्त्तिधारिन्), विक्रमणे (पादत्रयेन त्रिभुवनाक्रमणेन) बलिं (दानवपतिम् अतिदातृत्वगविणं) छलयसि (प्रतारयसि)। हे जगदीश, हे हरे, त्वं जय॥५॥ अनुवाद—हे सम्पूर्ण जगतके स्वामिन् ! हे श्रीहरे ! हे केशव ! आप वामन रूप धारणकर तीन पग धरतीकी याचनाकी क्रियासे बलि राजाकी वञ्चना कर रहे हैं। यह लोक समुदाय आपके पद-नख-स्थित सलिलसे पवित्र हुआ है। हे अद्भुत वामन देव ! आपकी जय हो॥५॥