गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ श्रीगीतगोविन्दम् शब्दसे वराहदेव भयानक रसके अधिष्ठाता रूपमें प्रकाशित होते हैं। इस पदमें उपमा अलङ्कार है। हे शूकररूप धारिण ! आपकी जय हो॥३॥ तव करकमलवरे नखमद्भुतशृङ्गम् दलितहिरण्यकशिपु-तनुभृङ्गम्। केशव धृत-नरहरिरूप जय जगदीश हरे ॥४॥ अन्वय—हे केशव ! हे धृत-नरहरिरूप ! (नृसिंहरूपधर) तब कर-कमलवरे (पाणिपङ्कज-श्रेष्ठे) अद्भुतशृङ्गं (अद्भुतं शृङ्गम् अग्रं यस्य तादृशं) दलित-हिरण्यकशिपु-तनु-भृङ्गं (दलिता विदारिता हिरण्यकशिपोः असुरराजस्य या तनुः शरीरं सा एव भृङ्गः येन तथाभूतं) नखं [शोभते इति शेषः], [अतिकोमलेन करकमल-केसरेण सुदृढ़-दैत्यदेहरूपभृङ्गदलनम् अदृष्टचरम्; अतएव अद्भुतम्] हे जगदीश, हे हरे, त्वं जय (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तस्व) ॥४॥ अनुवाद—हे जगदीश्वर ! हे हरे ! हे केशव ! आपने नृसिंह रूप धारण किया है। आपके श्रेष्ठ करकमलमें नखरूपी अद्भुत शृङ्ग विद्यमान है, जिससे हिरण्यकशिपुके शरीरको आपने ऐसे विदीर्ण कर दिया जैसे भ्रमर पुष्पका विदारण कर देता है, आपकी जय हो ॥४॥ पद्यानुवाद— अम्बुज कर खर नखसे अपने, हिरण्यकशिपुके हर सब सपने। केशव नरहरि-रूप लसे, जय जगदीश हरे ॥४॥ बालबोधिनी—चौथे पद्यमें श्रीजयदेवजीने नृसिंहावतारके रूपमें भगवान्का स्तवन किया है। दुःखकातर भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं कष्ट स्वीकार कर लेते हैं, पर दूसरोंका दुःख सहन नहीं कर पाते। दितिपुत्र हिरण्यकशिपुने अपने पुत्र