गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः २३ अन्वय—हे केशव ! हे धृत-शूकररूप ! (स्वीकृत-वराह- विग्रह) तव दशनशिखरे (दन्ताग्रे) लग्ना (अवस्थिता) धरणी (पृथिवी, लोकधारणकर्त्रीपि); शशिनि (चन्द्रे) निमग्ना कलङ्ककला (कलङ्करेखा) इव वसति (अवतिष्ठते); हे जगदीश, हे हरे, त्वं जय (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तस्व) ॥३॥ अनुवाद—हे जगदीश ! हे केशव ! हे हरे ! हे वराहरूपधारी ! जिस प्रकार चन्द्रमा अपने भीतर कलङ्कके सहित सम्मिलित रूपसे दिखाई देता है, उसी प्रकार आपके दाँतोंके ऊपर पृथ्वी अवस्थित है ॥३॥ पद्यानुवाद— दशन अग्र धरणी यह लग्ना, शोभित चन्द्र कलङ्क निमग्ना। केशव सूकर-रूप लसे, जय जगदीश हरे ॥३॥ बालबोधिनी—अष्टपदीके तृतीय पदमें भगवान्की स्तुति की गयी है। भगवान् पृथ्वीको धारण करते हैं, इतना ही नहीं, समस्त चराचरको धारण करनेवाली पृथ्वीको अपने दाँतोंपर अवस्थित कर चलते भी हैं। सृष्टिके प्रारम्भमें हिरण्याक्ष जब बीजभूता पृथ्वीका अपहरण करके रसातलमें चला गया था, तो श्रीभगवान्ने वराहरूप धारण किया और प्रलयकालीन जलके भीतर प्रविष्ट होकर अपने दाँतोंके अग्रभागपर पृथ्वीको उठाकर ऊपर ले आये तथा अपने सत्यसङ्कल्परूपी योगबलके द्वारा उसे जलके ऊपर स्थापित किया। जिस समय भगवान् अपने दाँतोंके अग्रभागपर पृथ्वीको उठाकर ला रहे थे, उस समय उनके उज्ज्वल दाँतोंके ऊपर पृथ्वी ऐसे सुशोभित हो रही थी, जिस प्रकार चन्द्रमाके भीतर उसके बीचमें उसकी कालिमा सुशोभित होती है। कविने भगवान्के दाँतोंको बालचन्द्रमाकी उपमा देकर उनके दाँतोंके महदाकारत्व तथा धरणीके अल्पाकारत्वको सूचित किया है। धरणी कलङ्क कलावत् निमग्ना है। निमग्न